Thursday, December 31, 2009

क्या मीडिया का एक धड़ा एन डी तिवारी का चेला है?

आंध्र प्रदेश में पोल सिर्फ नारायण दत्त तिवारी की ही नहीं खुली बल्कि मीडिया ने भी अपना बहुत कुछ गंवा दिया है। इस मामले में कुछ मीडिया संस्थानों ने जिस तरह की रिपोर्टिंग की है उससे एक बार फिर साफ हुआ है कि अगर किसी के पास ताक़त है और जातिगत औरा है तो बड़े से बड़े अपराध और घिनौने मामले में भी उसके पक्ष में माहौल तैयार किया जा सकता है। यही नहीं ऐसा माहौल भी बनाया जा सकता है कि जिससे उस ताक़तवर शख़्स के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाले शख़्स या संस्था को उस दुस्साहस की क़ीमत चुकानी पड़े।

Friday, December 25, 2009

वॉयस ऑफ इंडिया में अशोक उपाध्याय का निधन

वॉयस ऑफ इंडिया के सीनियर प्रोड्यूसर अशोक उपाध्याय नहीं रहे। आज सुबह दफ़्तर में उनकी मृत्यु हो गई। अशोक उपाध्याय करीब तीन-चार हफ्तों से लगातार नाइट शिफ्ट में काम कर रहे थे। आज सुबह उनकी तबीयत कुछ ख़राब हुई। बेचैनी मसहूस हुई। जिसके बाद वो खुली हवा में सांस लेने के लिए दफ़्तर से बाहर निकल आए और कुछ देर के लिए कार में बैठ गए। थोड़ी देर एक जूनियर लड़की उन्हें ढूंढते हुए पहुंची। उसने देखा कि वो कार में लेटे हुए हैं। उसके बाद जब मॉर्निंग शिफ्ट की टीम पहुंची तो हैंडओवर के लिए अशोक उपाध्याय को ढूंढा जाने लगा। तब लड़की ने बताया कि वो कार में लेटे हुए हैं और कुछ बोल नहीं रहे। फिर एक साथी वहां पहुंचा और उसने अशोक उपाध्याय को झकझोरा। लेकिन उनकी नींद नहीं टूटी।... ((read more))

Thursday, December 24, 2009

इस 'सिस्टम' में बार बार मरेगी रुचिका

♦ प्रभात शुंगलू


टीवी चैनलों पर चंडीगढ़ की विशेष अदालत के बाहर एसपीएस राठौर को हंसते, खिलखिलाते देखा तो लगा सरकार ने हरियाणा के पूर्व डीजीपी को किसी बड़े सम्मान से नवाज़ा हो। ये चेहरा उस शख़्स का चेहरा नहीं था जिसको अदालत ने 14 साल की लड़की रुचिका गिरहोत्रा के साथ छेड़खानी करने के आरोप में दोषी पाया हो। अदालत के फैसले में राठौर को अपनी जीत नज़र आई। जिस अदालत ने दोषी पाते हुए 6 महीने की क़ैद की सज़ा सुनायी उसी अदालत से तुरत फुरत ज़मानत भी मिल गयी। पूर्व डीजीपी सीना फूला कर अपने घर के लिए निकला। मानो वो मीडिया और देश को चिढ़ा रहा हो कि देखो कानून मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। .... ((Read More))

पी साईनाथ के जरिए महाराष्ट्र का सच जान कर प्रभाष जोशी को याद करें

मराठी, हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू – राज्य के तमाम अख़बारों में चुनाव के दौरान आप ऐसी कई आश्चर्यजनक चीजें देखेंगे जिन्हें छापने से इनकार नहीं किया गया था। एक ही सामाग्री किसी अख़बार में "ख़बर" के तौर पर छपी तो किसी अख़बार में "विज्ञापन" के तौर पर। "लोगों को गुमराह करना शर्मनाक है" – यह शीर्षक है नागपुर (दक्षिण-पश्चिम) से निर्दयील उम्मीदवार उमाकांत (बबलू) देवताले की तरफ़ से खरीदी गई ख़बर की। यह ख़बर लोकमत (6 अक्टूबर) में प्रकाशित हुई थी। उसके आखिरी में सूक्ष्म तरीके से एडीवीटी (एडवर्टिजमेंट यानी विज्ञापन) लिखा हुआ था। द हितवाद (नागपुर से छपने वाले अंग्रेजी अख़बार) में उसी दिन यह "ख़बर" छपी और उसमें कहीं भी विज्ञापन दर्ज नहीं था। देवताले ने एक बात सही कही थी – "लोगों को गुमराह करना शर्मनाक है।" ... read more

Wednesday, December 23, 2009

राठौर आदरणीय क्यों? मीडिया के भाषाई संस्कार पर सवाल


  • दिलीप मंडल
....

रुचिका के साथ छेड़खानी और उसकी आत्महत्या के मामले में भारतीय न्यायव्यवस्था ने कुछ नया या अजूबा नहीं किया है। न्यायप्रक्रिया में धन और रुतबे के महत्व के बारे में ये केस कोई नई बात नहीं कहता। देश के राष्ट्रपति रहे के आर नारायणन ने जब ये कहा था कि आजादी के बाद जिन लोगों को फांसी की सजा हुई है उनमें से कोई भी अमीर नहीं था, तो वो इसी सच को उद्धाटित कर रहे थे। हरियाणा के पूर्व पुलिस महानिदेशक एस.पी.एस. राठौर के साथ जो होने वाला है उसका अंदाजा हम इस मुकदमे की सुस्त रफ्तार से लगा सकते हैं। 19 साल में ये केस स्थानीय न्यायालय की सीमा को ही पार कर पाया है। इस रफ्तार से केस चला तो राठौर को जीवन का एक भी दिन शायद ही जेल में काटना होगा। ... Read More

मीडिया की मुहिम के बाद अब राठौर की खाल नहीं बचेगी


  • अजीत अंजुम
....

इस मामले (रुचिका के साथ हुई छेड़खानी और उसके बात पुलिसिया जुल्मों के जरिए उसे आत्महत्या के मुंह में ढकेलने और इस संगीन मामले में अदालत के बेतुके फैसले) को मीडिया ने पूरी जिम्मेदारी और गंभीरता के साथ उठाया है। आज तीसरे दिन भी अखबारों और न्यूज चैनलों पर रूचिका से साथ हुई नाइंसाफी का मामला छाया है। कोर्ट के फैसले के बाद हंसते हुए पूर्व डीजीपी राठौर की बेशर्मी और कानून को अपने ठेंगे पर रखने की उनकी हिमाकत को मीडिया ने खूब उछाला है। कई न्यूज चैनलों ने राठौर को मिली मामूली सज़ा के ख़िलाफ़ लगातार मुहिम चला रखी है। अब क्या चाहते हैं ? मीडिया इससे ज़्यादा क्या कर सकता है ? सच तो ये है कि आज से करीब 19 साल पहले जब ये मामला हुआ था, तब टीवी तो था नहीं, अखबार भी इतने नहीं ... Read More

कुंबले-धोनी मॉडल से सबक लें बीजेपी और कांग्रेस

देश के महान गेंदबाज अनिल कुंबले और सियासत के माहिर खिलाड़ी लाल कृष्ण आडवाणी का दूर-दूर तक कोई नाता नहीं, लेकिन अपने-अपने क्षेत्र में ये दोनों लीडरशिप को लेकर दिलचस्प केस स्टडी बन सकते हैं।

भारत जब टेस्ट क्रिकेट में दुनिया की नम्बर वन टीम बना, तो पूर्व कप्तान कुंबले ने अपने कॉलम एक अहम बात कही..."20 महीने पहले गैरी कर्स्टन के कोच बनने के बाद पूरी टीम ने नम्बर वन बनने का सपना देखा था। मैं कप्तान के तौर पर इस हसरत का हिस्सा रहा। लेकिन नंबर वन बनने में हर किसी का योगदान रहा। इसकी एक बड़ी वजह रही कि हर किसी के मन में ये साफ था कि हमें पहुंचना कहां है। ये पहले से ही तय था कि मेरा उत्तराधिकारी कौन होगा जिससे कि ये मिशन इसी मजबूती के साथ आगे बढ़ सके” अनिल कुंबले टेस्ट कप्तानी में अपने उत्तराधिकारी महेंद्र सिंह धोनी की ओर इशारा कर रहे थे...अगर कुंबले-धोनी दौर इस बात की मिसाल है कि कैसे अगली पीढ़ी को बेटन थमाया जाना चाहिए तो अटल-आडवाणी दौर इस बात की गवाह रही कि उत्तराधिकार तय करने में लापरवाही और दिशाहीनता कैसे एक पार्टी, एक विचारधारा और एक सोच को हाशिए पर ले जाती है।... ((Read More))

डरे हुए मोदी जनता की हर सांस पर पहरा बिठाना चाहते हैं

गुजरात विधानसभा में नगरपालिका चुनावों में कम्पल्सरी (अनिवार्य) वोटिंग का बिल ध्वनिमत से पास हुआ। वोटिंग होती भी तो सदन में ये बिल पास कराना सरकार के लिए मुश्किल नहीं था। लेकिन सवाल ये है कि आखिर कम्पल्सरी वोटिंग से क्या हासिल करना चाहती है मोदी सरकार? क्या दूसरी राज्य सरकारें या केन्द्र भी इस तरह का कानून लाएगा इस पर बहस छिड़ गयी है।

ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर और स्विट्जरलैंट जैसे देशों में अनिवार्य वोटिंग का कानून है। ऑस्ट्रेलिया में ये लगभग सौ साल पुराना कानून है जिसकी कहानी भी दिलचस्प है। पहली बार ऑस्ट्रेलिया में ये कानून 1914 में बना जब लिबरल पार्टी की सरकार थी। और ये कानून इसलिए बना क्योंकि उस साल क्वीन्सलैंड राज्य में चुनाव का वोट प्रतिशत 75 फीसदी था। और अगले साल यानि 1915 में देश में चुनाव होने वाले थे। लिबरल पार्टी को ये डर था कहीं लेबर पार्टी बाजी न मार ले जाए क्योंकि लेबर पार्टी के वोटर ज्यादा संगठित थे। इस कारण लिबरल पार्टी ने ये कानून बनाया मगर अगले साल के चुनाव में वो लेबर पार्टी से हार ही गयी। कहीं ऐसा तो नहीं कि लोक सभा में हार झेलने के बाद गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को अब बीजेपी के शहरी वोटर के दरकने का ख़तरा नज़र आ.... ((Read More))

Tuesday, December 22, 2009

अपराधी ताक़तवर हो तो मीडिया करता है सलाम

अपराधियों को लेकर भी मीडिया का चरित्र दोहरा है। अगर किसी साधारण शख़्स के ख़िलाफ़ अपराध साबित नहीं हुआ हो तो भी पत्रकार उसके लिए सख़्त भाषा का इस्तेमाल करते हैं। एक तरीके से अपराधी घोषित कर देते हैं। लेकिन अगर वही शख़्स ताक़तवर हो तो पत्रकारों और मीडिया संस्थानों की भाषा बदल जाती है। चाहे उस शख़्स का जुर्म साबित ही क्यों न हो गया हो। चाहे अदालत ने उसे गुनहगार ठहरा कर सज़ा ही क्यों न सुना दी हो।

ताज़ा मामला हरियाणा के पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौर से जुड़ा है। राठौर ने 19 साल पहले एक 14 साल की नाबालिग लड़की रुचिका गेहरोत्रा से छेड़खानी की थी। और मामला दर्ज होने के बाद इस वहशी दरिंदे ने रुचिका और उसके घरवालों को मानसिक यंत्रणा दी। अपने पुलिसिया ताक़त के जोर पर उनकी ज़िंदगी नर्क बना दी। आखिर में रुचिका ने 17 साल की उम्र में आत्महत्या कर ली और 2002 में उसके भाई ने भी आत्महत्या कर ली। राठौर के कुकर्मों की वजह से एक परिवार बर्बाद हो गया जबकि राठौर की तरक्की होती चली गई। सत्ता और नेताओं से गठजोड़ का फायदा उठा कर वह हरियाणा का डीजीपी बना और 2002 में .... read more

हिंदुस्तान टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट के बीच करार

हिंदुस्तान टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट के बीच कंटेंट के लिए करार हुआ है। अगले साल की पहली तारीख से लागू होने वाले इस करार का औपचारिक ऐलान कर दिया गया है। इस समझौते के मुताबिक हिंदुस्तान टाइम्स अब वाशिंगटन पोस्ट और न्यूज़वीक की ख़बरों और विश्लेषण को एक्सक्लूसिव तौर पर भारतीय पाठकों को मुहैया करा सकेगा। ख़बरों और लेखों के अलावा हिंदुस्तान टाइम्स में अब न्यूज़वीक के संपादक फरीद जकारिया, कॉलमिस्ट रॉबर्ट सेम्युल्शन और इंटरनेशनल हेराल्ड ट्रिब्यून के पूर्व संपादक डेविड इग्नेशियस जैसे चर्चित लेखकों और विचारकों के कॉलम भी छापे जाएंगे। इसके साथ ही हिंदुस्तान टाइम्स को बीजिंग, इस्लामाबाद, काबुल, बगदाद, लंदन, मास्को, नैरोबी, तेहरान, टोक्यो, मैक्सिको सिटी और पेरिस समेत दुनिया के कई देशों में मौजूद वाशिंगटन पोस्ट के संवाददाताओं की ख़बरों को एक्सक्लूसिव तौर पर छापने का अधिकार मिल गया है। ... read more

Monday, December 21, 2009

26/11 पर राम प्रधान कमेटी की रिपोर्ट पेश, कठघरे में गफूर

मुंबई में 26/11 के हमले के दौरान पुलिस की भूमिका की जांच के लिए बनी राम प्रधान कमेटी की रिपोर्ट आज महाराष्ट्र विधानसभा में रख दी गई। इस रिपोर्ट में कई खामियों की तरफ़ ध्यान खींचा गया है। तब के मुंबई पुलिस कमिश्नर हसन गफूर की जमकर खिंचाई की गयी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि गफूर पूरे ऑपरेशन के दौरान अपनी टीम का सही ढंग से नेतृत्व नहीं कर सके। वो ऑपरेशन के दौरान ट्राईडेंट होटल के बाहर जमे रहे और कंट्रोल रूम में नहीं गए, जो ग़लत था। यहां तक कि उन्होंने हमले के बाद सभी संबंधित लोगों को इसकी ठीक से जानकारी भी नहीं दी। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में मंत्रालय, सचिवालय और पुलिस के बीच तालमेल की कई कमियों को भी उजागर किया है। हालांकि इसी रिपोर्ट में ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर राकेश मारिया की ... ((read more))

इलाहाबाद में मुन्नी मोबाइल का लोकार्पण

पत्रकार प्रदीप सौरभ के पहले उपन्यास मुन्नी मोबाइल का आज इलाहाबाद में लोकार्पण हुआ। मशहूर आलोचक और विद्वान प्रोफेसर राजेंद्र कुमार ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के निराला सभागार में लोकार्पण समारोह की अध्यक्षता की। प्रोफेसर राजेंद्र कुमार बहुवचन पत्रिका के संपादक भी हैं। इस मौके पर उन्होंने कहा कि भूमंडलीकरण समाज को जोड़ता नहीं बल्कि बांटता है। एक नहीं होने देता। और साम्प्रदायिकता भी यही काम करती है। इन दोनों संदर्भों में प्रदीप सौरभ का उपन्यास मुन्नी मोबाइल काफी अहम है। यह उपन्यास साम्प्रदायिकता और भूमंडलीकरण – दोनों के ख़तरों से लोगों को आगाह करता था। प्रोफेसर राजेंद्र कुमार ने यह भी कहा कि मीडिया में रहते हुए यथार्थ को सामने लाना किसी चुनौती से कम नहीं। वह भी तब जब कहा जा रहा हो कि मीडिया बज़ार की ... (( read more))

Sunday, December 20, 2009

हिंदुस्तान-अमर उजाला में समझौता नहीं, एफ़आईआर दर्ज

बरेली में हिंदुस्तान और अमर उजाला के बीच कोई सुलह-सफाई नहीं हो सकी। जिसके बाद दोनों पक्षों ने इज्जत नगर थाने में एक दूसरे के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करा दी है। सूत्रों के मुताबिक हिंदुस्तान ने अमर उजाला के सात लोगों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कराया है जबकि अमर उजाला की तरफ से भी छह लोग नामजद कराए गए हैं। हिंदुस्तान की शिकायत पर आईपीसी की धारा 397 और 395 के तहत घायल करके लूटपाट करने का मामला दर्ज हुआ है। जबकि अमर उजाला की तरफ से लूटपाट की शिकायत की गई है। दोनों ही पक्षों ने एक दूसरे के प्रसार मैनेजर को आरोपी बनाया है। ... read more

Saturday, December 19, 2009

हिंदुस्तान और अमर उजाला की सर्कुलेशन टीमों में हिंसक झड़प

उत्तर प्रदेश के बरेली में हिंदुस्तान और अमर उजाला की सर्कुलेशन टीमों के बीच हिंसक झड़प हुई है। इस मारपीट में छह लोग घायल हैं। जिनमें से पांच को ज़्यादा चोटें आई हैं। उन्हें बरेली के जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया है। बरेली में दो महीने पहले ही, नौ अक्टूबर को हिंदुस्तान ने अपना संस्करण लॉन्च किया था। हिंदुस्तान ने रुहेलखंड इलाके के पांच जिलों – बरेली, पीलीभीत, शाहजहांपुर, लखिमपुर और बदायूं, को ध्यान में रख कर यह संस्करण शुरू किया। उससे पहले अख़बार ने पाठकों को बुकिंग के लिए प्रेरित करने के लिए एक स्कीम शुरू की। जिन लोगों ने बुकिंग कराई उन्हें एक कूपन दिया गया और ये वादा किया गया कि उन्हें एक साल तक हिंदुस्तान पचास फीसदी कम कीमत पर मिलेगा।... read more

Thursday, December 10, 2009

अंबानी बंधुओं की लड़ाई में नई दुनिया के हिस्से मलाई!


नई दुनिया ने एक बार फिर अनिल अंबानी की कंपनियों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया है। 11 अक्टूबर से 17 अक्टूबर तक एडीएजी (अनिल धीरूभाई अंबानी ग्रुप) की धांधली से पर्दा उठाने के बाद नई दुनिया ने अब फिर से अपनी स्टोरी को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया है। छह दिसंबर से अमूमन हर रोज़ अख़बार में एडीएजी पर कार्रवाई के लिए बढ़ते दबाव की स्टोरी छापी गई है। स्टोरी में कुछ भी ऐसा नहीं है जिस पर आपत्ति जताई जा सके। यह एक सहारनीय कदम है बशर्ते मंशा सही हो। जैसा की नई दुनिया के संपादक ने एक बार कहा था कि अगर कोई "ईमानदार" पत्रकार और अख़बार कॉरपोरेट घरानों की धांधली पर कोई मुहिम चलाता है तो भी लोगों को दिक्कत होने लगती है। हम उन लोगों में शामिल नहीं होना चाहते जिन्हें दिक्कत होती है। लेकिन यहां पर कुछ बातें हैं जो साफ़ कर देनी चाहिए। पहली बात नई दुनिया की मंशा से जुड़ी ...... ((READ MORE))

Tuesday, December 8, 2009

एनडीटीवी ने बेच दिया इमैजिन

एनडीटीवी ने अब यह सार्वजनिक कर दिया है कि उसने एनडीटीवी इमैजिन को टर्नर एशिया पेसिफिक वेंचर्स को बेच दिया है। कंपनी ने अपने 76 फीसदी शेयरों का सौदा 6.70 करोड़ डॉलर यानी करीब 313 करोड़ रुपये में किया है। समझौते के मुताबिक कंपनी को चैनल के 5 करोड़ डॉलर के ताज़ा शेयर जारी करने ... ((read more))

Monday, December 7, 2009

45 देश 56 अख़बार और एक संपादकीय

अख़बारों के इतिहास में ऐसा शायद ही कभी हुआ हो, जब किसी मुद्दे पर दुनिया के 45 देशों के 56 अख़बारों ने एक जैसा संपादकीय छापा हो और वो भी पहले पन्ने पर। पर्यावरण पर मंडरा रहे ख़तरे की तरफ़ ध्यान खींचने के लिए यह कदम उठाया गया है। इसमें बताया गया है कि अब लड़ने का वक़्त ज़रा भी नहीं है। सबको मिल कर और तात्कालिक लाभ-नुकसान को थोड़े समय के लिए भुला कर ठोस कदम उठाना होगा। राष्ट्र और राज्य की सीमाओं से ऊपर उठ कर इस मसले पर गंभीरता से सोचना होगा।

इस संपादकीय में कोपेनहेगन सम्मेलन में हिस्सा ले रहे 192 देशों के प्रतिनिधियों से बिना झिझक, बिना विवाद ग्रीन हाउस गैसों को कटौती के लिए फैसला लेने की अपील की गई है। कहा गया है कि पूरब-पश्चिम और अमीरी-गरीबी जैसे मुद्दों की आड़ में लंबे समय तक पर्यावरण की अनदेखी करना सही नहीं है। अगर इस दानव से निपटने के लिए एकजुट होकर त्याग की भावना के साथ रणनीति नहीं बनाई गई तो धरती का पारा चढ़ेगा। धरती का पारा हल्का सा भी चढ़ा तो ग्लेशियरों का पिघलना और तेज़ होगा। समुद्र में जल स्तर ऊपर... ((read more))

Wednesday, December 2, 2009

शेयर बाज़ार में दैनिक भास्कर की छलांग

दैनिक भास्कर के प्रकाशक डीबी कॉर्प अब शेयर बाज़ार में दाखिल हो रहे हैं। इसी महीने कंपनी इनिसियल पब्लिक ऑफर लॉन्च करेगी। ख़बरों के मुताबिक दिसंबर के दूसरे सप्ताह में आईपीओ लाने की तैयारी है। बाज़ार में माहौल बनाने और निवेशकों की नज़र में आने के लिए दैनिक भास्कर पिंक अख़बारों में ताबड़तोड़ विज्ञापन छपवा रहा है। बुधवार को इकॉनोमिक टाइम्स में आधे पन्ने का विज्ञापन छपवाया गया था।

आईपीओ की कीमत क्या होगी अभी यह तय नहीं हुआ है। लेकिन ख़बरों के मुताबिक आईपीओ के ज़रिए डीबी कॉर्प की योजना बाज़ार से 450 करोड़ रुपये ... ((read more))

अमर उजाला में कई नई नियुक्तियां

अमर उजाला मैनेजमेंट अपने मार्केटिंग विभाग को मजबूत करने में जुटा है। इसी के तहत एस एन झा को जीएम (सरकारी बिज़नेस और मिनी मेट्रोज) के तौर पर नियुक्त किया गया है। वो दिल्ली में बैठेंगे और आलोक माथुर, वाइस प्रेसिडेंट (मीडिया सॉल्युशन्स) को रिपोर्ट करेंगे। माथुर भी कुछ समय पहले ही अमर उजाला में आए हैं और वो प्रेसिडेंट (मार्केटिंग) सुनील मुत्रेजा को रिपोर्ट करते हैं।

इनके अलावा राष्ट्रीय सहारा से यादवेश कुमार ने पूर्वी और मध्य उत्तर प्रदेश के जीएम (एसपीएमडी) के तौर पर ज्वाइन किया है। साथ ही कुछ बदलाव और किए गए हैं। एस एन झा से पहले जीएम (सरकारी बिज़नेस) का काम देख रहे ए पी सिंह को लखनऊ भेज दिया गया है। वो लखनऊ यूनिट को हेड करेंगे। जबकि लखनऊ का काम संभाल रहे वीरेंद्र पठानिया को पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के एसपीएमडी (सर्कुलेशन) बना दिया गया है। ये सभी सुनील मुत्रेजा को रिपोर्ट करेंगे। ... ((read more))

Wednesday, November 25, 2009

अजमल कसाब के नाम एक हिंदुस्तानी का ख़त

आमिर अजमल कसाब,
तुम 26 नवंबर 2008 को फक्र से याद करोगे। हमारे दिलो-दिमाग में भी वो दिन हमेशा हमेशा के लिये चस्पा हो चुका है। वो वहशी तीन दिन जब तुमने और तुम्हारे नौ साथियों ने मिलकर मुंबई में खूनी खेल खेला था। लेकिन एक और दिन मेरे जहन की गहराइयों में उतर चुका है - 23 फरवरी 2009। उस दिन सारा हिंदुस्तान टकटकी लगाये अपने अपने घरों में टीवी देख रहा था। अमरीका के सबसे रंगीन शहर लॉस एंजीलीस में ऑस्कर अवार्ड दिये जा रहे थे। दुनिया भर में संगीत से जुड़े कलाकारों को उनके उम्दा काम के लिये नवाजा जा रहा था। उम्मीद से लब्रेज़ दो हिन्दुस्तानी कलाकार भी उस जलसे में शामिल थे। मैं तुम्हें उनसे मिलवाता हूं। तुम्हारी ही तरह दोनों इस्लाम धर्म को मानने वाले। एक का नाम है - अल्लाह रख्खा रहमान। और दूसरे का रेसूल पुकुट्टी

रहमान और रेसूल को उस दिन ऑस्कर मिला। क्या हिंदू, क्या मुसलमान, ईसाई, सिख, जैन, बौद्ध - फक्र से 120 करोड़ हिंदुस्तानियों का सीना चौड़ा हो गया। हिन्दुस्तान में टूरिस्ट की तरह आते तो देखते इन सभी धर्मों को मानने वालों का जलवा लेकिन तुम तो मियां शैतानी दिमाग के आदमी निकले...तुम तो एके 56 ..... (read more)

Wednesday, October 7, 2009

एस्सार ग्रुप को ग्लोबल ब्रांड बनाएंगे शिवनाथ ठुकराल

शिवनाथ ठुकराल को लेकर चल रहा सस्पेंस ख़त्म हो गया। एनडीटीवी से अलग होने के अब उन्होंने एस्सार ग्रुप से रिश्ता जोड़ लिया है। इसके साथ ही उन्होंने मीडिया सेक्टर को अलविदा कह दिया। शिवनाथ ठुकराल ने एस्सार ग्रुप में कॉरपोरेट ब्रांडिंग और स्ट्रेटेजिक इनिसिएटिव के ग्रुप प्रेसिडेंट का पद भार संभाला है। अपने करीबी दोस्तों के भेजे गए ई-मेल में शिवनाथ ठुकराल ने इसकी पुष्टि कर दी है।

उधर एक्सचेंज फॉर मीडिया पर छपी ख़बर के मुताबिक एस्सार ग्रुप के चेयरमैन शशि रुइया ने कहा है कि "भारतीय बिजनेस, वित्तीय बाज़ार और आर्थिक मामलों में शिवनाथ के पास अच्छा अनुभव है। दुनिया के बड़े अर्थशास्त्रियों और सीईओ से उनके संपर्क हैं। एस्सार ग्रुप की ब्रांडिंग को बेहतर बनाने और कंपनी को एक ग्लोबल ब्रांड के तौर पर विकसित करने में उनके अनुभव से.... READ MORE

Tuesday, October 6, 2009

"दैनिक भास्कर पर दया कीजिए"

दैनिक भास्कर की ग़लती पर पाठकों ने बहुत तीखी प्रतिक्रिया दी है। बीते 24 घंटों में 500 से अधिक लोग इसे पढ़ चुके हैं। पढ़ने वालों की संख्या की तुलना में प्रतिक्रियाएं कम आयी हैं लेकिन जो भी आयी हैं उन्हें गंभीरता से लिया जाना चाहिए। यह सही है कि पोर्न पढ़ने वालों की संख्या बहुत ज़्यादा होती है। यह भी सही है कि अश्लील साहित्य के पाठक भी बहुत हैं। लेकिन समाचार पत्रों को ही अश्लील बना दिया जाए और आधी आबादी को उपभोग की वस्तु यह कहीं से भी सही नहीं है। इसका पुरजोर विरोध होना चाहिए। बहुत से पाठकों ने हमें फोन करके यह भी कहा कि अगर कोई गाली तो क्या आप भी उसे गाली दीजिएगा। उन्हें एतराज हमारे शीर्षक पर था। “लौंडागीरी” शब्द के इस्तेमाल पर था। उनकी बात सही है। कोई बड़ा अख़बार, कोई बड़ा मीडिया संस्थान लाख नंगई करे हमें शालीन बने रहना चाहिए। आगे से हम कोशिश करेंगे कि बहुत गुस्सा आने पर भी अपनी भाषा संतुलित रखें। बहरहाल, दैनिक भास्कर की ग़लती पर आई टिप्पणियों में से चंद पर आप भी नज़र डालें। .... read more

Monday, October 5, 2009

दैनिक भास्कर ने महिलाओं को दी गाली

दैनिक भास्कर की एक ख़बर उल्लेखनीय है। इस ख़बर से पता चलता है कि जहां कहीं भी न्यूज़रूम में सही अनुपात में महिलाएं नहीं होती हैं वहां आधी आबादी से जुड़ी ख़बरों को किस घटिये नज़रिए से प्रस्तुत किया जा सकता है। इस ख़बर से अंदाजा लगाया जा सकता है कि दैनिक भास्कर के न्यूज़रूम में भी महिलाएं नाम मात्र की होंगी और शायद ऊंचे पदों पर तो नहीं के बराबर। आगे बढ़ने से पहले आप उस ख़बर पर एक नज़र डालें जिसकी चर्चा हो रही है। -

मिनीस्कर्ट में चीन के “नए हथियार” वेंकटेशन वेंबू, हांगकांग
एक अक्टूबर को अपने राष्ट्रीय दिवस परेड में चीन ने अपनी मारक क्षमता और युद्धक हथियारों का जमकर प्रदर्शन किया था। इसमें परमाणु क्षमता से लैस अंतरमहाद्वीपीय बैलेस्टिक मिसाइलें भी शामिल थीं। ये मिसाइलें यूरोप और अमेरिका तक मार कर सकती हैं। हालांकि इस पर अधिक चर्चा नहीं हो रही है। वहां चर्चा “व्यापक नरसंहार वाले” दूसरे हथियारों की अधिक है, जो परेड में दिखे .... ((read more))

Thursday, October 1, 2009

गूगल के "G" बन गए गांधी

आज दो अक्टूबर है और आधी रात से गूगल पर महात्मा गांधी नज़र आने लगे हैं। गूगल ने उन्हें अपना "जी" (google - का पहला g) बना दिया है। टेलीविजन चैनलों पर भी आज महात्मा गांधी को सजाया और बेचा जाएगा। कहीं गांधी पर फिल्में दिखाई जाएंगी। तो न्यूज़ चैनलों उनके जीवन पर विशेष बनाएंगे। अख़बारों में तो एक दिन पहले से ही उन्हें याद किया जाने लगा है। एक दिन के लिए बुजुर्ग गांधीवादियों की डिमांड बढ़ गई है। मेरे पास भी एक दो फोन आ चुके हैं कि कोई गांधीवादी जान-पहचान का हो तो बताना। उन्हें स्टूडियो बुलाना है। भोर होने के साथ ही देखिएगा नेता लोग राजघाट जाकर उनकी समाधि पर फूल चढ़ा आएंगे। इस रस्मअदायगी में ... ((read more))

Sunday, September 6, 2009

इंडिया टीवी की करतूत से भड़की सरकार

वाईएसआर रेड्डी से जुड़ी इंडिया टीवी की ख़बर से सरकार भड़की हुई है। इंडिया टीवी ने दो सितंबर की रात नौ बजे राजशेखर रेड्डी के ज़िंदा होने की ख़बर दी थी। आदिवासियों के हवाले से बताया था कि नल्ला मल्ला के जंगलों में रेड्डी का सुराग मिल गया है और वो ज़िंदा हैं। रेड्डी को देखने वाले आदिवासियों ने वन विभाग को यह ख़बर दे दी है। सूत्रों के मुताबिक इस ख़बर के बाद सरकार में हड़कंप मच गया। दिल्ली से लेकर आंध्र प्रदेश सभी जगह हलचल बढ़ गई। वन विभाग के अधिकारियों से जानकारी मांगी गई। सबने ऐसी किसी सूचना से इनकार कर दिया। राज्य सरकार के नुमाइंदों से बात हुई। उन्होंने भी मना कर दिया। नेताओं से... मंत्रियों से सभी से बात की गई और जब सबने इस ख़बर को अफवाह बताया तो मुख्य सचिव को कहा गया कि वो इस का खंडन करें .... ((READ MORE))

Thursday, September 3, 2009

छंटनी पसंद नहीं, कोशिश होगी सब साथ चलें- शशि शेखर

जनतंत्र से हिंदुस्तान के नव नियुक्त एडिटर-इन-चीफ की ख़ास बातचीत


अमर उजाला के समूह संपादक शशि शेखर शुक्रवार से हिंदुस्तान की ज़िम्मेदारी संभालने जा रहे हैं। अमर उजाला ने उनकी अगुवाई में एक लंबा सफ़र तय किया। कई मौकों पर आदर्श भी प्रस्तुत किया है। हाल ही में चुनाव के दौरान जब बहुत से मीडिया संस्थान नेताओं के आगे-पीछे घूम रहे थे और पैकेज का खेल खेल रहे थे तो अमर उजाला ने इस राह पर चलने से इनकार कर दिया। यह एक साहसिक फ़ैसला रहा और इसके लिए अमर उजाला की तारीफ़ की जाती है। हिंदुस्तान में समूह संपादक की जिम्मेदारी संभाले से ठीक पहले शशि शेखर ने जनतंत्र से तमाम मुद्दों पर खुल कर बात की। अमर उजाला में मिले अनुभव साझा किये। अपनी ज़िंदगी और अपने डर पर बात की। इन सबके बीच जो सबसे अहम बात निकल कर आई वो यह कि हिंदुस्तान से कोई निकाला नहीं जाएगा। शशि शेखर हिंदुस्तान अकेले जा रहे हैं और फिलहाल कोई नई टीम ले जाने का इरादा नहीं है। आप उनका इंटरव्यू पढ़िए और अपनी प्रतिक्रिया दीजिए। ... ((READ MORE))

Sunday, August 23, 2009

वॉयस ऑफ इंडिया का प्रसारण फिर शुरू

वॉयस ऑफ इंडिया का प्रसारण फिर शुरू हो गया है। दो दिन पहले चैनल के कर्मचारियों की हड़ताल से इसका प्रसारण रुक गया था। लेकिन मैनेजमेंट के आश्वासन के बाद सभी कर्मचारी बिना शर्त काम पर वापस लौट आए हैं। रात 12 बजे बुलेटिन रोल किया गया और उसके साथ ही चैनल फिर से ऑनएयर हो गया ।

शुक्रवार को जोरदार हंगामे के बाद तकनीकी कर्मचारियों ने चैनल का प्रसारण रोक दिया गया था। तीन महीने से तनख्वाह नहीं मिलने के कारण वो काफी निराश थे। उसी बीच कहीं से अफवाह उड़ी कि कंपनी चैनल को बंद करने जा रही है। इस अफवाह से उनकी उम्मीदें टूट गईं और गुस्सा भड़क गया। उन्होंने चैनल का प्रसारण रोक दिया और बात यहां तक पहुंची कि पुलिस बुलानी पड़ी। लेकिन अब सबकुछ सामान्य है।

वॉयस ऑफ इंडिया के समूह संपादक किशोर मालवीय के मुताबिक ..((. read more))

Friday, August 21, 2009

“वॉयस ऑफ इंडिया” ख़ामोश

वॉयस ऑफ इंडिया का प्रसारण बंद हो गया है। कर्मचारियों के विद्रोह के बाद वहां पर पुलिस बुलानी पड़ी। वॉयस ऑफ इंडिया का दफ़्तर दिल्ली से सटे नोएडा में है और आज शाम न्यूज़ चैनल के कर्मचारियों ने उसका प्रसारण रोक दिया। ख़बरों के मुताबिक उन कर्मचारियों को बीते तीन महीने से तनख्वाह नहीं मिली है और मैनेजमेंट के रवैये से वो बेहद भड़के हुए हैं।

वॉयस ऑफ इंडिया त्रिवेणी ग्रुप का न्यूज़ चैनल है। उसमें करीब दो सौ कर्मचारी काम करते हैं। उन सभी को पिछले साल दिसंबर में भी तनख्वाह नहीं मिली थी। वो विवाद पहले से था। उसके अलावा मई से उन्हें तनख्वाह नहीं दी गई है। इसी बीच कहीं से एक ख़बर आई कि आज रात कंपनी चैनल को बंद कर सकती है। जिसके बाद कर्मचारियों के सब्र का बंध टूट गया। उन्होंने तुरंत प्रसारण रोक दिया और धरने पर बैठ गए। कर्मचारियों के उग्र तेवर को देखते हुए वहां पर पुलिस बुलानी पड़ी है। ... ((READ MORE))

प्रभाष जी की पंडिताई में तथ्यों की ऐसी-तैसी

प्रभाष जोशी बड़े पत्रकार हैं। बहुत बड़े पत्रकार। इसलिए इतनी उम्मीद की जाती है कि उनके विचार चाहे जो भी हों, लेकिन उन्हें स्थापित करने के लिए वो सही तथ्य लेकर आएंगे। लेकिन रविवार डॉट कॉम में दिए इंटरव्यू में अपनी बातों को साबित करने के लिए वो बेहद बेतुकी बातें कर गए हैं। एक दो नहीं बल्कि कई ग़लत तथ्यों को प्रस्तुत किया। लगता है कि सुनी सुनाई बातों को वो सच मान बैठे हैं। फैक्ट्स के मामले में ऐसी असावधानी अक्षम्य है क्योंकि आप प्रभाष जोशी हैं, शलाका पुरुष। ... (READ MORE)

हर चीज को जाति के चश्मे से मत देखिए प्रभाष जी

पत्रकारिता में आने से पहले से प्रभाष जोशी को पढ़ रहा हूं। उनके लिखे ने उनका सम्मान इतना बढ़ाया है कि कई बार दूसरों से बहस में झगड़े की नौबत आ गई। प्रभाष जोशी के विरोधी उन पर दो ही आरोप लगाते रहे हैं एक कि भीतर से वो घोर संघी हैं और दूसरी घोर ब्राह्मणवादी। लेकिन जो भी मुझसे ये कहता था मैं उसे "हिंदू होने का धर्म" पढ़ने की सलाह दे देता। बीते 17 साल के लेखन में प्रभाष जी ने बीजेपी की जो खाट खड़ी की है उससे एक धारणा तो ऐसी बनती ही है कि वो संघ के मुरीद होंगे तो होंगे लेकिन उनकी कलम संघ के बंधन में नहीं है। केंद्र में जब एनडीए की सरकार थी तब मैंने कई बार जनसत्ता में प्रभाष जी के तीखे लेख पढ़े हैं। उन्होंने स्वयंसेवक प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की कई मुद्दों पर कड़ी आलोचना की है। वैसी आलोचना कोई खांटी पत्रकार ही कर सकता है।

ये सम्मान हाल-फिलहाल और बढ़ गया, जब प्रभाष जी ने समाचार पत्रों की दलाली के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला। वैसे इस मसले को उठाने का श्रेय वॉल स्ट्रीट जरनल के पॉल बेकेट को दिया जाना चाहिए। उन्होंने ही मई की शुरुआत में अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया था कि ख़बरों के पैकेज का कैसा गंदा खेल चल रहा है? लेकिन यह भी एक सत्य है कि प्रभाष जी के लेख के बाद इस मुद्दे पर जो बहस हुई है उससे थोड़ी हलचल जरूर हुई। प्रभाष जी ने दस मई को अपना पहला लेख लिखा "ख़बरों के पैकेज का काला धंधा।" अगले हफ़्ते 17 मई को दूसरा लेख लिखा "चौकीदार का चोर होना।" घूम घूम कर इस मुद्दे पर हवा बनाने लगे। लगा कि प्रभाष जी की अगुवाई में दलाली करने वालों को सज़ा भले ही नहीं मिले लेकिन दलालों की असलियत सामने ज़रूर आएगी। उस बहस से लोगों के दिलो दिमाग पर पड़ी धूल झड़ जाएगी। ठंडे पड़े लहू में हल्का ही सही उबाल आएगा। भविष्य में सकारात्मक बदलावों की नींव तैयार होगी। लेकिन ऐसा होता उससे पहले ही प्रभाष जी ने अपने विरोधियों को अपने ऊपर हमले का एक औजार थमा दिया है। सिर्फ़ विरोधियों को ही क्यों मुझ जैसे कई प्रशंसकों का मोह भी भंग .... (READ MORE)

क्या यही आपकी परंपरा है प्रभाष जी?

रविवार डॉट कॉम पर छपे प्रभाष जोशी के इंटरव्यू ने एक झटके में वह सब सामने ला दिया है जो अब तक पर्दे की ओट में था। एक गांधीवादी, अहिंसावादी, सेक्यूलर और जनपक्षीय संपादक-पत्रकार का यह असली सच जितना चौंकाता है, इससे कहीं अधिक आक्रोश पैदा करता है। लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करने वाले इस वरिष्ठ पत्रकार-लेखक ने इस इंटरव्यू में परंपरा, ट्रेनिंग और कौशल के बहाने न केवल लोकतंत्र की आत्मा को घायल किया है, बल्कि उन लोगों को भी अपमानित किया है, जिनकी सामाजिक पृष्ठभूमि प्रभु वर्ग की नहीं है।

अपने साक्षात्कार में जोशी जी ने कहा है "विनोद कांबली का एटीट्यूड बना कर रखने और लेकर जाने का नहीं है। कुछ कर दिखाने का है।" अब जोशी जी को क्या यह बताना पड़ेगा कि कांबली जिस सामाजिक पृष्ठभूमि से आते हैं, वहां सम्मान के साथ जीने की एकमात्र शर्त है- कुछ कर दिखाने का जज्बा। कभी-कभी तो कुछ कर दिखाने का जज्बा भी उनके जी का जंजाल बन जाता है। यकीन न आए तो खैरलांजी की घटनाओं को फिर से याद कर लीजिए। तस्वीर साफ हो जाएगी।... (READ MORE)

Wednesday, August 19, 2009

ब्रह्म से संवाद करते ब्राह्मण यानी प्रभाष जोशी का विराट रूप देखिए

"सिलिकॉन वैली अमेरिका में नहीं होता, अगर दक्षिण भारत में आरक्षण नहीं लगा होता. दक्षिण के आरक्षण के कारण जितने भी ब्राह्मण लोग थे, ऊंची जातियों के, वो अमरीका गये और आज सिलिकॉन वेली की हर आईटी कंपनी का या तो प्रेसिडेंट इंडियन है या चेयरमेन इंडियन है या वाइस चेयरमेन इंडियन है या सेक्रेटरी इंडियन है. क्यों ? क्योंकि ब्राह्मण अपनी ट्रेनिंग से अवव्यक्त चीजों को हैंडल करना बेहतर जानता है. क्योंकि वह ब्रह्म से संवाद कर रहा है. तो जो वायवीय चीजें होती हैं, जो स्थूल, सामने शारीरिक रूप में नहीं खड़ी है, जो अमूर्तन में काम करते हैं, जो आकाश में काम करते हैं. यानी चीजों को इमेजीन करके काम करते हैं. सामने जो उपस्थित है, वो नहीं करते. ब्राह्मणों की बचपन से ट्रेनिंग वही है, इसलिए वो अव्यक्त चीजों को, अभौतिक चीजों को, अयथार्थ चीजों को यथार्थ करने की कूव्वत रखते है, कौशल रखते हैं. इसलिए आईटी वहां इतना सफल हुआ. आईटी में वो इतने सफल हुए."

ये कौन बोल रहा है और इस समय ऐसा क्यों बोल रहा है। राज्यसभा चुनाव से ठीक पहले ये कौन है जो अपने ब्राह्मण रूप का सार्वजनिक प्रदर्शन कर रहा है। इस खास समय में एक साथ हिंदूत्ववादियों-आरएसएस और कम्युनिस्टों को आजादी की लड़ाई का गद्दार कहते हुए वो क्या हासिल करना चाहता है। .... (READ MORE)

सहारा के कर्मचारी नहीं करेंगे सरेंडर

सहारा से हटाए जा रहे कर्मचारी अब लंबी लड़ाई लड़ने का मन बना रहे हैं। करीब 30-35 कर्मचारियों का एक दल आज लखनऊ गया है। इन कर्मचारियों की कोशिश सहारा के मालिक सुब्रत राय से मुलाकात करने की है। अगर उनसे भेंट नहीं हुई या फिर भेंट होने पर कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला तो ये कर्मचारी उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती से मिलने की कोशिश करेंगे। कर्मचारियों का कहना है कि अगर जरूरत पड़ी तो वो अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे लेकिन इस्तीफ़ा नहीं देंगे।

कर्मचारी मंदी की दलील को हजम करने को तैयार नहीं। नाम नहीं छापने की शर्त पर .... ((READ MORE))

Tuesday, August 18, 2009

सहारा में सुनामी, 48 कर्मचारियों से मांगा इस्तीफ़ा

सहारा के लोग अब बेसहारा हो रहे हैं। उन्हें बेसहारा कोई और नहीं बल्कि उनकी ही कंपनी कर रही है। ताज़ा ख़बर के मुताबिक मंगलवार को 48 रिपोर्टरों, कैमरामैनों और टेक्नीशियनों से मैनेजमेंट ने इस्तीफ़ा मांगा। ज़्यादातर कर्मचारियों ने मैनेजमेंट के इस आदेश को मानने से इनकार किया जिसके बाद बात इतनी बढ़ी कि रात आठ बजे उन सभी को गेस्टहाउस खाली करने का हुक्म दे दिया गया।

नाम नहीं छापने की शर्त पर सहारा के एक कर्मचारी ने इस पूरे मामले का ब्योरा दिया। बताया कि मैनेजमेंट ने उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश के स्टाफ रिपोर्टरों और कैमरामैनों को एक बैठक के लिए दिल्ली आने का न्योता दिया। दिल्ली पहुंचने पर उन सभी से कहा गया कि वो तीन महीने की बेसिक तनख्वाह लेकर ... (READ MORE)

Sunday, August 16, 2009

यहां "शहाबुद्दीन”, “बजाज” और “ये पत्रकार” एक जैसे हैं!

राज्य (राज) सभा में जाने लायक जितने भी नाम आपने गिनाए हैं, वे सभी शायद एक “मनोनीत” पद के लिए हैं। विडंबना यह है कि इन सबके अलावा भी जो संभावित नाम हो सकते हैं, उनमें से कोई ऐसा नहीं, जो बिना सर्वश्रेष्ठ “भक्ति” साबित किए “राष्ट्रपति” की कृपा पा सकने में सक्षम हों। अपनी क्षमता भर सबने ऐसा किया ही है, या कर रहे हैं। हां, रूप-स्वरूप अलग-अलग हो सकते हैं। लेकिन “यह किए जाने” को हम इस तर्क से जस्टीफाई कर सकते हैं कि अगर हमारे “लोकतंत्र” के साठ से ज्यादा सालों का हासिल यही है कि देश के सबसे “पाक-साफ मंदिर” में जगह पाना है तो तमाम धतकर्मों में अपनी कुशलता दर्शानी होगी, तो वहां जाने की इच्छा रखने वालों का क्या गुनाह...!

रुकिए नहीं। लेकिन रुक कर थोड़ा देखना होगा। क्या आप शहाबुद्दीन, सूरजभान, राजा भैया, पप्पू यादव जैसे तमाम नामों के संसद या विधानसभाओं में पहुंचने से परेशान होते हैं? बंदूक की बदौलत अपनी सियासी हैसियत कायम करने वालों से निश्चित तौर पर हमारी पवित्र प्रतिनिधि संस्थाओं की पवित्रता भंग होती है। बंदूक की बुनियाद पर पले-बढ़े लोगों द्वारा इसका इस्तेमाल करके संसद या विधानसभाओं में पहुंचने पर हमें बहुत दुख होता है, लेकिन आश्चर्य... ((READ MORE))

Saturday, August 15, 2009

चंदन मित्रा के नाम एक खुला पत्र

परम आदरणीय चंदन मित्रा जी,


आपके दुख ने मुझे विचलित कर दिया है... आपके भावुकताभरे उदगार पढ़कर मेरी आंखें भर आयी हैं। आखिर आपके साथ ऐसा क्यों हुआ? जब आप छह साल में बड़ी मेहनत से संसद का कामकाज सीखकर पक्के हो गए थे, तो आपको निकाल दिया गया। भला ये भी कोई इंसाफ है? कुछ साल और नहीं रख सकते थे? माना कि आप बीजेपी खेमे के पत्रकार हैं, लेकिन अब आप कह तो रहे हैं कि संसद के भीतर निष्पक्षता से काम किया है। ये भी बता दिया है कि आपने कैसे अपने बाल-सखा अरुण जेटली के साथ मिलकर संसद में सरकार के साथ सहयोग किया। पिछले सत्र में हुए कामकाज की तारीफें भी कर रहे हैं। इतना कहने पर भी निष्ठुर सरकार मान नहीं रही।

अपनी निष्पक्षता और 'लचीलेपन' का सबूत तो आपने मतगणना के दौरान एक न्यूज़ चैनल के स्टूडियो में बैठे-बैठे ही दे दिया था। मुझे अच्छी तरह याद है कि आप कैसे बढ़चढ़ कर बीजेपी की ... (READ MORE)

Friday, August 14, 2009

चंदन मित्रा की सबसे बड़ी कामयाबी और सबसे बड़ा दुख

क्या किसी पत्रकार के लिए राज्यसभा में मनोनीत होना इतनी बड़ी कामयाबी हो सकती है कि उसके आगे ज़िंदगी के सभी काम बौने नज़र आने लगें? अगर ऐसा है तब तो सभी पत्रकारों का सिर्फ़ एक ही ध्येय होना चाहिए कि वो जनहित में नहीं बल्कि राज्यसभा में चुने जाने की शर्तों के आधार पर पत्रकारिता करें। लेकिन हमने और आपने ऐसे कई पत्रकारों को देखा है जिन्होंने पूरी ज़िंदगी कलम का मान रखा। सत्ता के सामने समर्पण की जगह सत्ता के ख़िलाफ़ संघर्ष किया। जनहित की पत्रकारिता के लिए बहुत कुछ भोगा और सहा। लेकिन चंदन मित्रा जैसे कुछ पत्रकार हैं जिनके लिए राज्यसभा में मनोनीत होना उनकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी उपलब्धि है। चंदन मित्रा ने राज्यसभा से रिटायर होने के बाद द पायनियर में अपनी बात रखी है। वो राज्यसभा से रिटायर होने पर बहुत दुखी हैं। चंदन मित्रा कहते हैं कि अब उनके पास छह साल का अनुभव है और वो बेहतर तरीके से संसदीय व्यवस्था में योगदान कर सकते हैं। लेकिन अब वो राज्यसभा में नहीं हैं।

यही नहीं चंदन मित्रा संसदीय कामकाज की एक झलक भी पेश करते हैं। चंदन कहते हैं कि वो अपनी ज़िंदगी में एक रात भी किसी गांव में नहीं ठहरे हैं। लेकिन वो एक ऐसी स्थाई समिति का हिस्सा रहे जिसने नरेगा की समीक्षा की। आगे बढ़ने से पहले चंदन मित्रा के उस संस्मरण के कुछ हिस्से आप भी पढ़िए। ... READ MORE

Wednesday, August 12, 2009

राज्यसभा की रेस में हैं कई दिग्गज पत्रकार!

राज्यसभा से बीते हफ़्ते मनोनित सदस्यों की विदाई हो गई। विदा होने वालों में चंदन मित्रा भी रहे। राज्यसभा से जिस दिन विदाई हुई बताया जाता है कि चंदन मित्रा भावुक हो गए। सत्ता और भावुकता के बीच रिश्ता ही कुछ ऐसा है। जो कोई भी सत्ता से जाता है वो भावुक हो जाता है। लेकिन यहां मुद्दा भावुकता का नहीं है। मुद्दा है कि फिर से कुछ नामी गिरामी चेहरे राज्यसभा के लिए मनोनित होने वाले हैं। चंदन मित्रा के जाने से जो स्थान खाली हुआ है उसे भरने के लिए कई बड़े पत्रकार इन दिनों सेटिंग-गेटिंग करने में लगे हैं। सत्ता के गलियारों से छन छन कर जो ख़बर आ रही है, उसके मुताबिक शेखर गुप्ता, आलोक मेहता, वीर सांघवी, विनोद मेहता , पंकज वोहरा और मृणाल पांडे राज्यसभा की रेस में हैं।

शेखर गुप्ता इंडियन एक्सप्रेस के संपादक हैं। एनडीटीवी पर.... ((READ MORE))

Tuesday, August 11, 2009

ख़बर बनाने के लिए टीवी एंकर ने कराए पांच क़त्ल!

अभी तक आपने ख़बर के तौर पर सेक्स, क्राइम और अंधविश्वास बेचते तो सुना था। पैसे कमाने के लिए ख़बरों का धंधा भी करते सुना था। लेकिन क्या कोई ख़बरों के लिए किसी का क़त्ल करा सकता है। ये सोचने में हैरानी होती है। लेकिन ब्राजील में पुलिस ने एक टीवी एंकर पर कार्यक्रम की रेटिंग बढ़ाने के लिए और ड्रग्स तस्करी के धंधे में फायदे के लिए कई लोगों की हत्या कराने का आरोप लगाया है। इस टीवी एंकर का नाम है वालास सूजा। वालास सूजा कुछ समय के लिए पुलिस में भी काम कर चुके हैं और इस वक़्त टीवी एंकरिंग के साथ सियासत भी कर रहे हैं। वो अभी ब्राजील के अमेजोनास प्रांत के एक इलाके के प्रतिनिधि हैं।

ब्राजीली पुलिस के मुताबिक वालास का दखल ड्रग्स की तस्करी में भी है। इसी धंधे को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने अलग-अलग वारदात में पांच लोगों की ... read more

गूगल और माइक्रोसॉफ्ट की लड़ाई में फेसबुक भी कूदा

गूगल ने एक बड़े राज़ से पर्दा उठा दिया है। गूगल की टीम पिछले कई महीने से एक नए सर्च इंजन पर काम कर रही है। एक ऐसा सर्च इंजन जो नई पीढ़ी की जरूरत के हिसाब से हो। इसके लिए गूगल ने चुपके से फीडबैक मंगाने शुरू कर दिया है। वेबसर्च के इस नए सिस्टम का नाम कैफीन रखा गया

आमतौर पर गूगल अपने सर्च इंजन में कुछ न कुछ बदवाल करता आया है। लेकिन 2006 के बाद बड़े स्तर पर कोई बदला नहीं हुआ है। गूगल के इंजीनियरों के मुताबिक किसी भी सर्च इंजन को तैयार करने में तीन मुख्य बातों का ध्यान रखना होता है। एक जितनी भी कमांड के तुरंत बाद वेब पर मौजूद अरबों पन्नों में से जरूरत के पन्नों को छांटना। फिर तेजी से उन्हें एक क्रम में लगाना और उसके बाद रैंक और रेटिंग के हिसाब से उन्हें सर्च इंजन पर पेश करना। इन्हीं बातों को ध्यान में रख कर पहले से कहीं अधिक बेहतर .... (READ MORE)

मीडिया को हॉलीवुड अभिनेत्री की धमकी

हॉलीवुड अभिनेत्री एशले ग्रीन ने दुनिया भर की न्यूज़ और इंटरटेनमेंट वेबसाइटों को चेतावनी दी है। उन्होंने कहा है कि अगर किसी ने ग़लती से भी उनकी न्यूड तस्वीरें छापी तो उसके ख़िलाफ़ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। सोमवार को किसी ने उनकी ऐसी तस्वीरें इंटरनेट पर डाल दी। इससे एशले ... ((READ MORE))

Monday, August 10, 2009

प्रभात ख़बर, हरिवंश और उनका नीतीश प्रेम

अगर एक अखबार किसी भी सरकारी नीति के खिलाफ आयोजित विरोध प्रदर्शन के प्रति इस हद तक आक्रामक हो जाए कि समाज से इसके विरुद्ध खड़ा होने का आह्वान करने लगे, तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि उसके इस पक्ष के निहितार्थ क्या होंगे और एक अखबार जब खुलेआम एक पक्ष बन जाता है तो कितना बुरा हो सकता है। राजू रंजन जी ने अपने लेख में इस मसले पर काफी कुछ कह दिया है और वे ठीक कहते हैं कि दूसरों की अयोग्यता पर अंगुली उठाने वालों को पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिए।

उम्मीद की जानी चाहिए कि अपनी मांगों के लेकर नवनियुक्त शिक्षा मित्रों के आंदोलन के प्रति अपने घृणा-प्रदर्शन के बाद ‘प्रभात खबर’ को इस बात का अहसास हो कि उसने क्या किया है। ‘हे ईश्वर, इन्हें माफ करना, ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं’- जैसा जुमला उछालने के तत्काल बाद इस अखबार में ‘दर्शक’ के नाम से प्रकाशित लंबे लेख में कहा जाता है कि इन शिक्षा मित्रों को नहीं पता कि बिहार का भविष्य इन्हें कभी माफ नहीं करेगा। जैसे कि ये बिहार के भविष्य के नियंता हों और... ((READ MORE))

कोई अख़बार जवाब भी नहीं देता, बेशर्मी की हद है!

सियासतदानों और नौकरशाहों की बेशर्मी तो हमने और आपने बहुत देखी है। संसद से सड़क तक उनकी बेशर्मी के उदाहरण मिल जाएंगे। लेकिन अब मीडिया भी बेशर्मों की इस जमात में शामिल हो गया है। जनसत्ता में इस बार वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी ने मीडिया की इसी बेशर्मी से पर्दा उठाया है। उन्होंने कहा है कि चुनाव के दौरान ख़बरों का सौदा करने वाले अख़बार अपने अपराधों पर कोई बहस भी नहीं करना चाहते। प्रभाष जी ने अख़बारों की आलोचना के साथ साइबर स्पेस पर सक्रिय पत्रकारों की तारीफ़ भी की है। उन सभी से प्रभाष जी की अपील है कि वो इस बहस को ज़िंदा रखें। बहस जारी रही तो नए रास्ते भी खुलेंगे। जनसत्ता से साभार हम प्रभाष जोशी जी का ये लेख आपके बीच रख रहे हैं। आप भी पढ़िये और अपनी प्रतिक्रिया दीजिए। .... ((read more))

Sunday, August 9, 2009

"आपसे आग्रह है कि ये बहस यहीं बंद कर दें"

दैनिक जागरण के वरिष्ठ फोटोग्राफर अजीत कुमार ने जनतंत्र को एक चिट्ठी भेजी है। इस चिट्ठी में भोले शंकर की तरह उन्होंने विष का प्याला पीते हुए कबूल किया है कि प्रकाश कुमार का फोटो उन्होंने ही जानबूझ कर ब्लर किया था और इसके लिए दैनिक जागरण के संपादक शैलेंद्र दीक्षित और ब्यूरो चीफ सुभाष पांडे को दोष देना सही नहीं है। उन्होंने ऐसा क्यों किया, इसके पीछे उनके अपने तर्क हैं। उन तर्कों से आप सहमत हो सकते हैं और असहमत भी। लेकिन हम उनके इस साहस का सम्मान करते हुए दैनिक जागरण के फोटो प्रकरण पर चली बहस को यहीं रोकना चाहते हैं। वैसे भी इस बहस में अब कुछ बचा नहीं है। बातचीत मुद्दे से भटक कर निजी आरोप-प्रत्यारोप की तरफ मुड़ चुकी है। इसलिए हम अजीत कुमार की इस स्वीकारोक्ति को आपने सामने रख रहे हैं... इस उम्मीद में कि आप भी इस बहस को यहीं ख़त्म समझेंगे और मामले को ज़्यादा तूल नहीं देंगे।... ((read more))

Saturday, August 8, 2009

चुप्पी टूटेगी और टूटेंगे मीडिया के सभी मठ

किसी भी अख़बार को उठाइए और तमाम ख़बरों को पढ़िए। संपादकीय पृष्ठ पर मौजूद लेखों को भी पढ़िए। आप पाएंगे कि अख़बारों में आमतौर पर किसी शख़्स की आलोचना होती और किसी की तारीफ़। वो शख़्स कोई भी हो सकता है। मंत्री, नेता, अधिकारी, अभिनेता या फिर कारोबारी... कोई भी हो सकता है। आलोचना सभी की होती है। सवाल सभी पर खड़े किए जाते हैं। किसी न किसी मुद्दे पर और किसी न किसी वक़्त पर। यहां सवाल उठता है कि आखिर दूसरों की आलोचना करने वाले पत्रकारों का खुद की आलोचना को लेकर क्या रवैया रहता है?

ये एक सोचने लायक विषय है। स्वस्थ आलोचना और स्वस्थ बहस किसी भी लोकतंत्र के बुनियादी तत्व हैं। सरकार की नीतियों की आलोचना नहीं होगी तो नीतियों में सुधार नहीं होगा। ऊंचे पदों पर बैठे अधिकारियों और नेताओं के ग़लत कामों की समीक्षा नहीं होगी तो वो निरंकुश हो जाएंगे। इसलिए आलोचना बहुत ज़रूरी है और आलोचना के दौरान उठे मुद्दों पर व्यापक बहस भी उतनी ही ज़रूरी है। लेकिन क्या हम पत्रकार मीडिया से जुड़े मुद्दों पर और व्यक्तियों पर बहस के लिए तैयार हैं?

इस सवाल पर आप जितनी बार गौर कीजिएगा, आपको एक ही जवाब मिलेगा - नहीं। हम आलोचना के लिए ज़रा भी तैयार नहीं। कोई हमारी हल्की सी निंदा कर दे तो हम आसमान सिर पर उठा लेते हैं। बिफर पड़ते हैं। हम हमले करने का हौसला तो रखते हैं लेकिन हम पर कोई अंगुली उठा दे ..... READ MORE

Friday, August 7, 2009

मणिपुर में मीडिया पर हमला

मणिपुर की राजधानी इंफाल में एक स्थानीय अख़बार पावोजेल के दफ़्तर पर हमला हुआ है। हमला कर्फ्यू के दौरान गुरुवार की शाम को हुआ। उस वक़्त अख़बार के दफ़्तर में कुछ कर्मचारी काम कर रहे थे और किसी ने बाहर से गोली चला दी। ये कर्मचारियों की खुशकिस्मती है कि गोली से किसी को कोई नुकसान नहीं हुआ। मणिपुर में 23 जुलाई को पुलिस कमांडो ने संजीत नाम के युवक की हत्या कर दी। मणिपुर पुलिस कमांडोज (एमपीसी) के मुताबिक संजीत को मुठभेड़ में मारा गया, लेकिन तहलका पर छपी तस्वीरें और स्थानीय लोग उसके दावे को खोखला साबित .... READ MORE

दैनिक जागरण और उसकी "फोटो कलाकारी"

दैनिक जागरण के हल्द्वानी संस्करण के 16वें पेज पर एक रंगीन तस्वीर छपी है। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी खादी पहने, गांधी टोपी लगाए नमस्कार कर रहे हैं और बगल में दीया मिर्जा खड़ी हैं। नीचे कैप्शन दिया गया है "दिलकश दीया मिर्या ने राहुल गांधी के बारे में राय पूछे जाने पर कहा, मैं उन्हें पसंद करती हूं।"

उसी अख़बार में पृष्ठ संख्या 13 पर राहुल गांधी की एक और फोटो है। ये ब्लैक एंड व्हाइट है। इसमें भी राहुल ठीक उसी लिबास में और उसी मुद्रा में हाथ जोड़े खड़े हैं। उनके पीछे मौजूद व्यक्ति भी वही है। बस यहां पर राहुल गांधी के बगल में हैं कांग्रेस नेता रीता बहुगुणा और सामने है एक कांग्रेस कार्यकर्ता – जो उन्हें सैल्यूट .... (READ MORE)

Thursday, August 6, 2009

“जिम्मेदारी तो संपादक को ही लेनी पड़ती है”

बिहार में दैनिक जागरण और उसके संपादक पर उठाए गए सवाल पर बहस अब तेज़ हो रही है। बहस का मुद्दा है कि अगर किसी अख़बार से कोई ग़लती हो गई हो तो उसके लिए जिम्मेदार किसे ठहराया जाए? क्या किसी संपादक को यह हक़ है कि वह अख़बार की अच्छाइयों को कबूल करे लेकिन बुराइयों के लिए व्यवस्था को दोषी ठहरा कर पल्ला झाड़ ले? यहां बात किसी एक अख़बार या फिर किसी एक संपादक की नहीं है। बात पूरे मीडिया जगत की है। संकट विश्वास का है। जनतंत्र पर जारी इसी बहस को आगे बढ़ाने के लिए हमने बिहार के दो वरिष्ठ पत्रकारों से कुछ सवाल पूछे। उनके जवाब आपके सामने हैं। आप पढ़ें और अपनी प्रतिक्रिया दें। .... ((READ MORE))

मीडिया में दफ़न हैं सुलगते मणिपुर की ख़बरें

क्या मणिपुर भारत का हिस्सा नहीं है? अगर है तो फिर मीडिया में उसके साथ इतना सौतेला व्यवहार क्यों? बीते दो हफ्तों से मणिपुर सुलग रहा है। सोमवार और मंगलवार को वहां पर व्यापक बंद रहा। लेकिन मीडिया में ख़बरों के नाम पर सन्नाटा पसरा हुआ है। ऐसा लगता है कि मणिपुर किसी और मुल्क का हिस्सा है और वहां हो रही घटनाओं से इस देश का और इसके लोगों को कोई वास्ता नहीं।

23 जुलाई को मणिपुर पुलिस कमांडो के छह जवानों ने मिल कर संजीत चोंग्खम नाम के एक युवक की हत्या कर दी। उस युवक को इंफाल में भरे बाज़ार गोली मारी गई। पुलिस के मुताबिक संजीत चोंग्खम एक उग्रवादी था। उसे जब पुलिस ने घेरा तो उसने रिवॉल्वर से गोली दागी। जवाबी कार्रवाई में मारा गया। लेकिन बाज़ार में मौजूद लोग पुलिस का सच और झूठ जानते थे। उन्होंने देखा कैसे संजीत को जवान लेकर वहां पहुंचे और फिर कैसे एक दुकान के भीतर उसे गोली मारी गई। और कैसे उसके शव को टांग कर बाहर लाया गया।

लोगों ने पुलिस का ये ख़ौफ़नाक चेहरा आंख के सामने देखा था। एक कान से दूसरे कान बात इतनी फैली की हंगामा खड़ा हो गया। कार्रवाई की मांग ... ((READ MORE))

Wednesday, August 5, 2009

शिक्षक नशेड़ी, गंजेड़ी हैं तो क्या पत्रकार संत हैं?

राजू रंजन प्रसाद प्रगतिशील विचारों वाले बेहद शालीन और सज्जन शख़्स हैं। इतिहास और समाजशास्त्र में गहरी पैठ है। पटना से उन्होंने पीएचडी की है। कुछ खास मसलों पर समझौता नहीं कर सके, इसलिए किसी कॉलेज में प्रोफेसर नहीं बन पाए। फिलहाल राज्य सरकार के एक स्कूल में नवनियुक्त शिक्षक हैं और पूरी ईमानदारी से बच्चों को पढ़ाते हैं। साहित्य और आलोचना में भी इन्होंने काफी काम किया है। हाल ही में पटना में जब अस्थाई शिक्षकों ने अपनी मांगों के साथ विरोध प्रदर्शन किया तो पुलिस ने शिक्षकों को दौड़ा-दौड़ा पीटा। उसके बाद कुछ पत्रकारों ने शिक्षकों की आलोचना शुरू की। आलोचना की एक मर्यादा होती है। लेकिन कई पत्रकार ये मर्यादा भी लांघ गए। राजू रंजन प्रसाद ऐसे तमाम पत्रकारों से पूछ रहे हैं कि गिरावट कहां नहीं आई है? क्या पत्रकारिता का स्तर नहीं गिरा है? क्या पत्रकारों की भाषा नहीं बिगड़ी है? आप उनका ये लेख पढ़िये और हो सके तो उनके सवालों का अपने स्तर पर ही सही जवाब दीजिए।

नवनियोजित शिक्षकों के आन्दोलन की खबरें बिहार के अखबारों में ‘प्रभात खबर’ ने सबसे शानदार तरीके से छापीं लेकिन ‘सुशासनी।’ डांट से अब ये ‘उल्टी गंगा बहाने’ लगे हैं। अनुराग कश्यप, दर्शक (लेखक हैं तो बुर्के में क्यों हैं?) और सुरेन्द्र किशोर इन शिक्षकों को अयोग्य साबित करने पर तुले हैं। शायद कोई ‘सरकारी फरमान’ मिला हो या कि ‘राजकीय पत्रकार’ नियुक्त होने के लिए ये लोग भी ‘दक्षता परीक्षा’ से गुजर रहें हैं। अनुराग कश्यप जी शिक्षकों को गुटखा-पान खाने वाला बता कर अयोग्य घोषित करना चाहते हैं। अगर योग्यता-अयोग्यता का यह भी एक पैमाना है तो न चाहते हुए भी कहना पड़ रहा है कि मद्यपान का प्रतिशत पूरी दुनिया में और खासकर बिहार में, किसी भी अन्य पेशे के लोगों से ज्यादा पत्रकारों में है। यहां तो ‘पियक्कड़’ होना एक अच्छा पत्रकार होने की पूर्व शर्त की तरह है। आप पत्रकार हैं तो मालूम ही होगा कि .... READ MORE

Tuesday, August 4, 2009

पत्रकार का क़ातिल जैश मोहम्मद का आतंकी

इराक में एक आतंकवादी ने पत्रकार अतवार बहजत के बलात्कार और क़त्ल का गुनाह कबूल कर लिया है। 22 फरवरी 2006 को अल अरेबिया की रिपोर्टर और एंकर अतवार की बगदाद में हत्या कर दी गई थी। जांच एजेंसियों ने उस आतंकवादी का वीडियो भी जारी किया है।
जांच एजेंसियों के मुताबिक जैश मोहम्मद के आतंकी यासिर अल तखी ने अपने दो भाइयों और एक साथी के साथ मिल कर अतवार और उनकी टीम का अपहरण किया। फिर उसके दोनों भाइयों ने अतवार के कैमरामैन अदनान अब्दुल्ला और साउंड इंजीनियर खालिद मोहसिन की हत्या कर दी। जबकि उनका चौथा साथी किसी तरह भागने में कामयाब हो गया। उसके बाद यासिर ने बंदूक की नोक पर अतवार का बलात्कार किया और गोली मार दी। जांच अधिकारियों के मुताबिक ... ((READ MORE))

संस्कृति के रक्षकों कहो- किसकी रोटी में किसका लहू है?

भारतीय संस्कृति अक्सर खतरे में पड़ जाती है। और फिर उसे बचाने के लिए बहुत से लोग कमर कसने लगते हैं। लेकिन संस्कृति है कि फिर से खतरे में पड़ जाती है....अपनी इस महान संस्कृति को कभी सविता भाभी खतरे में डाल देती हैं, तो कभी सच का सामना इसे तार-तार करने पर उतारू हो जाता है। कभी सहमत की प्रदर्शनी इसकी दुश्मन बन जाती है, तो कभी मक़बूल फ़िदा हुसैन की पेंटिंग इस पर कालिख पोतने लगती है। भारतीय संस्कृति के रक्षकों को बड़ा गुस्सा आता है। वो सबकुछ बर्दाश्त कर सकते हैं, लेकिन संस्कृति पर हमला? इसे तो हरगिज़ बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। सबका गुस्सा देख कई बार मुझे भी लगता है, इतने समझदार लोग गुस्सा कर रहे हैं, ज़रूर कोई वाज़िब बात होगी। आखिर हम भारतवासी हैं, भारतीय संस्कृति पर हमला कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं? सोचता हूं मुझे भी संस्कृति की रक्षा में जुटे लोगों का साथ देना चाहिए।

भारतीय संस्कृति की रक्षा का फैसला कर तो लिया, लेकिन इस पर अमल कैसे करूं समझ नहीं आ रहा। आखिर जिसकी रक्षा करनी है, उसका अता-पता, उसकी पहचान तो मालूम होनी चाहिए। दिक्कत यहीं है। मैं समझ ही नहीं पा रहा हूं कि आखिर ये भारतीय संस्कृति है क्या चीज़? एक बार संघ प्रशिक्षित एक वीएचपी नेता ने मुझे समझाया था कि हिंदू - मुसलमान एक मुल्क में एक साथ क्यों नहीं रह सकते। उनकी दलील थी - दोनों की संस्कृति अलग है। हिंदू पूरब की ओर मुंह करके पूजा करता है, मुसलमान पश्चिम की ओर मुंह करके। हिंदू हाथ धोते हुए कोहनी से हथेली की ओर पानी डालता है, मुसलमान वज़ू करते हुए पहले हथेली में पानी लेता है, फिर कोहनी तक ले जाता है। हिंदू का तवा बीच में गहरा होता है, मुसलमान का बीच में उठा हुआ होता है...कितनी अलग है दोनों की संस्कृति...कैसे रह सकते हैं साथ-साथ? आशय ये था कि हिंदू-मुसलमान की राष्ट्रीयता .... (( READ MORE))

Monday, August 3, 2009

"40 हज़ार कोड़े सह सकती हूं, अपमान नहीं"

"मैं इस मामले को ऊपरी अदालत तक ले जाऊंगी। अगर जरूरत पड़ी तो संविधान पीठ तक। अगर वहां भी मुझे गुनहगार ठहराया गया तो मैं चालीस कोड़े खाने को तैयार हूं। सिर्फ चालीस क्यों, मैं चालीस हज़ार कोड़े खाने को तैयार हूं। अगर सभी महिलाएं सिर्फ पहनावे को लेकर कोड़े खाने की हक़दार हैं तो मुझ पर भी चालीस हज़ार कोड़े बरसाए जाएं।"

ये कहना है सूडान की पत्रकार लुबना अहमद अल हुसैन का। लुबना समेत तीन महिलाएं पैंट पहनने के कारण अभद्र व्यवहार की आरोपी हैं। लुबना के मुताबिक उन्हें कोड़े बर्दाश्त हैं लेकिन अपमान बर्दाश्त नहीं। वो इसे नारी जाति का अपमान मानती हैं। मानवता का अपमान मानती हैं। लुबना चाहती तो इस मुकदमे से बच सकती थीं। संयुक्त राष्ट्र की कर्मचारी होने के नाते ..... READ MORE

ये संपादक तो बड़ा ख़तरनाक है

क्या किसी पत्रकार को ये हक़ है कि वो निजी खुन्नस निकालने में अपने संस्थान का इस्तेमाल करे? इस सवाल का सीधा जवाब है - नहीं। किसी भी पत्रकार को ऐसा नहीं करना चाहिए और ना ही उसे ये हक़ दिया जाना चाहिए। इसी सिलसिले में दिल्ली के एक मीडिया संस्थान का एक वाकया ध्यान आ रहा है। वहां के एक कर्मचारी ने किसी इंस्टीट्यूट को डराने के लिए संस्थान का बेजा इस्तेमाल कर दिया था। इंस्टीट्यूट की तरफ से शिकायत मिलने पर उस कर्मचारी को नौकरी छोड़नी पड़ी। लेकिन आप हर कंपनी से ऐसी आचार संहिता की उम्मीद नहीं कर सकते। खासकर जब वो कंपनी अपने कर्मचारियों का इस्तेमाल अनैतिक तरीके से धन जुटाने में करती हो।

तीस जुलाई को पटना के दैनिक जागरण में एक तस्वीर छपी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और जॉर्ज फर्नांडिस की। जॉर्ज राज्यसभा का पर्चा भरने के लिए पटना पहुंचे हुए थे। ये तस्वीर मोर्या होटल में खींची गई थी। जॉर्ज और नीतीश के पीछे पटना के ही एक वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश कुमार मौजूद थे। बताया जाता है कि प्रकाश कुमार और दैनिक जागरण के स्थानीय संपादक शैलेंद्र दीक्षित से रिश्ते ठीक नहीं हैं। दोनों में झगड़ा है। झगड़ा की जगह खुन्नस शब्द ज़्यादा बेहतर रहेगा। दोस्ती की तरह खुन्नस भी निजी होती है। बेहद निजी। लेकिन दैनिक जागरण के संपादक ने निजी खुन्नस बेहद ओछे तरीके से सार्वजनिक.... ((READ MORE))

एक मिनट रुकिए, पुलिस का क्रूर चेहरा देखिए

अभी जनतंत्र पर चल रही बहस को बीच में रोकते हुए आप सभी से तहलका डॉट कॉम पर छपी एक ख़बर पढ़ने की गुजारिश कर रहा हूं। उस ख़बर का हेडर है मर्डर इन प्लेन साइट। ऐसी ख़बरें बहुत कम ही पढ़ने, देखने और सुनने को मिलती हैं। हम सब जानते हैं कि किस तरह सुरक्षाबल अपने अधिकार का बेजा इस्तेमाल करके बेकसूर लोगों को गोलियों से छलनी करते हैं। ये राज्य का आतंकवाद है जिसके आगे किसी भी तरह का आतंकवाद अदना सा लगता है। जम्मू कश्मीर, छत्तीसगढ़ और उत्तर पूर्व ज़्यादातर राज्यों में इस आतंकवाद का घिनौना चेहरा देखने को मिल जाएगा। तहलका ने जिस चेहरे को उजागर किया है वो चेहरा मणिपुर का है।

23 जुलाई को इंफाल में संजीत नाम का एक युवक मुठभेड़ में मारा जाता है। मणिपुर पुलिस कमांडो के जवान उसे घेर कर मार ..... READ MORE

Sunday, August 2, 2009

“नाराज़गी इसलिए तो नहीं कि लेखक “अनवर” है”

अनवर जमाल अशरफ़के लेख के बाद "सच का सामना" पर होने वाली बहस ने नया मोड़ ले लिया है। समरेंद्र के दोनों लेख - लूटपाट, क़त्ल और व्यभिचार के लिए एकजुट हों ! और सबसे पहले तो बंद करो “सच का सामना” में संस्कृति की बात कहीं नहीं थी। लेकिन अनवर के लेख के बाद अब सारा ध्यान भारतीय संस्कृति पर केंद्रित हो गया है। हालांकि अनवर ने भाड़ शब्द का इस्तेमाल एक मुहावरे के तौर पर किया है, लेकिन विरोध करने वालों को सबसे ज़्यादा एतराज इसी बात का है कि लेखक ने भारत की महान संस्कृति को भाड़ में क्यों झोंक दिया? इससे लगता है कि क्यों नहीं जनतंत्र पर एक बहस भारतीय संस्कृति पर भी हो जाए। जो भी इस महान संस्कृति पर अपनी बात रखना चाहते हैं वो खुल कर कहें। हम उनकी राय को सम्मान पूर्वक जगह देंगे। इसकी शुरुआत करते हैं अनवर के लेख पर आई कुछ जोरदार टिप्पणियों से। आप इन्हें पढ़ें और सहमति-असहमति दर्ज कराएं।

अनवर के लेख पर काफी बहस हुई है। लेकिन इस बहस में लेख के मुख्य विषय से ज़्यादा ज़ोर एक खास वाक्य पर है। बहुत से लोगों को एतराज़ है कि अनवर ने "भाड़ में जाए ऐसी संस्कृति क्यों लिख दिया।" हालांकि अनवर ने ये नहीं लिखा कि भारतीय संस्कृति भाड़ में जाए। इसके ठीक उलट पूरे लेख को पढ़ें, तो उनकी ये राय साफ ज़ाहिर होती है कि भारतीय संस्कृति इतनी मज़बूत है कि एक टीवी शो उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। इसी बात को और भी ज़ोर देकर और चुनौतीपूर्ण अंदाज़ में कहने के लिए ही उन्होंने लिखा है कि "अगर आधे घंटे का एक टेलीविज़न शो सदियों पुरानी संस्कृति को उखाड़ फेंक रहा हो, तो भाड़ में जाए ऐसी संस्कृति।" इस वाक्य का ये अर्थ निकालना कि लेखक भारतीय संस्कृति को भाड़ में झोंकना चाहते हैं, भाषाई अभिव्यक्ति की कच्ची समझ के सिवा कुछ नहीं है। पहला वाक्य अगर ठीक से समझ में न आ रहा हो, तो भी पूरे लेख को पढ़ने के बाद तो लेखक की राय समझ में आ ही जानी चाहिए। अंतिम पैराग्राफ से ठीक पहले वाले पैराग्राफ में अनवर ने लिखा है, "अगर वाक़ई शो संस्कृति को मार रहा हो, तो फिर संस्कृति ही इसे मार देगी। भारत की संस्कृति कोई जुमा जुमा आठ दिन की संस्कृति तो है नहीं।" इसके बाद भी कुछ लोग पता नहीं क्यों इतने भड़के हुए हैं? कहीं इसके पीछे वजह ये तो नहीं कि लेख 'अनवर जमाल अशरफ' ने लिखा है?
- अनिकेत

.... ((READ MORE))

"नाराज़गी इसलिए तो नहीं कि लेखक "अनवर" है"

अनवर जमाल अशरफ़ के लेख के बाद "सच का सामना" पर होने वाली बहस ने नया मोड़ ले लिया है। समरेंद्र के दोनों लेख - लूटपाट, क़त्ल और व्यभिचार के लिए एकजुट हों और सबसे पहले तो बंद करो “सच का सामना” में संस्कृति की बात कहीं नहीं थी। लेकिन अनवर के लेख के बाद अब सारा ध्यान भारतीय संस्कृति पर केंद्रित हो गया है। हालांकि अनवर ने भाड़ शब्द का इस्तेमाल एक मुहावरे के तौर पर किया है, लेकिन विरोध करने वालों को सबसे ज़्यादा एतराज इसी बात का है कि लेखक ने भारत की महान संस्कृति को भाड़ में क्यों झोंक दिया? इससे लगता है कि क्यों नहीं जनतंत्र पर एक बहस भारतीय संस्कृति पर भी हो जाए। जो भी इस महान संस्कृति पर अपनी बात रखना चाहते हैं वो खुल कर कहें। हम उनकी राय को सम्मान पूर्वक जगह देंगे। इसकी शुरुआत करते हैं अनवर के लेख पर आई कुछ जोरदार टिप्पणियों से। आप इन्हें पढ़ें और सहमति-असहमति दर्ज कराएं। .... ((READ MORE))

ये नीतीश की उदारता नहीं चालाकी है

जिन आंखों में समाजवाद का सपना तैरता हो, उन्होंने ना जाने कितनी बार जॉर्ज फर्नांडीस पर अभिमान किया होगा। 60 और 70 के दशक के जॉर्ज को देखकर ये उम्मीद जगती थी कि हुकूमतें चाहे कितनी भी जालिम हों, उनके खिलाफ एक जॉर्ज है, जो जान की बाजी लगाकर खड़ा होने को तैयार रहता है। इमरजेंसी के बाद हाथों में हथकड़ी लगी जॉर्ज की तस्वीर ने जॉर्ज को कइयों का आदर्श और हीरो बना दिया था। जॉर्ज कम्युनिस्ट तो कभी नहीं रहे लेकिन चे गुएवारा की याद को भारतीय मानस पर उन्होंने जरूर उतार दिया था। लेकिन नब्बे का दशक आते आते उन्हीं जॉर्ज के मुंह से समाजवाद की बातें हास्यास्पद लगने लगीं। ... ((READ MORE))

Saturday, August 1, 2009

"ट्रस्ट नहीं बनने दिया, इसलिए निशाने पर हूं"

बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के चेंबर में जो कुछ भी हुआ उस पर वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश कुमार अफसोस जाहिर कर चुके हैं। कन्हैया भेलारी भी उस घटना को शर्मनाक बता रहे हैं। वो मानते हैं कि उन्हें ऐसा कुछ नहीं कहना चाहिए था जिससे प्रकाश कुमार के सम्मान को ठेस पहुंची। लेकिन उनका ये भी कहना है कि प्रकाश को उनका मजाक पसंद नहीं आया तो वो शब्दों के जरिए विरोध जता सकते थे। जनतंत्र से वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेलारी की बातचीत।


सवाल – मुख्यमंत्री के चेंबर में आखिर झगड़े की नौबत क्यों आई? प्रकाश से आपका झगड़ा किस बात पर हुआ?
कन्हैया भेलारी - मैं जब मुख्यमंत्री के चेंबर में घुसा तब वहां पहले से क्या बातचीत चल रही थी इसका मुझे अंदाजा नहीं था। मैंने जब .... (READ MORE)

Friday, July 31, 2009

"हम पत्रकारों का सिर शर्म से झुका जा रहा है"

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दफ़्तर में पत्रकारों के बीच मारपीट से वहां का मीडिया जगत हैरान है। सब इसे बहुत दुखद और शर्मनाक बता रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकारों के मुताबिक इससे पत्रकारिता का दामन दाग़दार हुआ है और इसकी हर किसी को खुल कर निंदा करनी चाहिए। ये इसलिए भी जरूरी है ताकि आगे से ऐसी कोई हरकत नहीं हो। जनतंत्र ने इस बारे में बिहार के कई प्रतिष्ठित पत्रकारों से बात की।

उनकी प्रतिक्रिया पढ़ने के लिए रीड मोर पर क्लिक करें ... READ MORE

Thursday, July 30, 2009

मुख्यमंत्री के चेंबर में पत्रकारों ने की मारपीट

बिहार की राजधानी पटना में पत्रकार मुख्यमंत्री के चेंबर में भिड़ गए। मामला प्रेस क्लब की राजनीति से जुड़ा है और अब इस घमासान में मारपीट होने लगी है। पत्रकार अपनी सभी मर्यादाओं को ताक पर रख एक दूसरे की बखिया उधेड़ने में जुटे हैं। शब्दों का इस्तेमाल करने वाले शब्दों की गरिमा को भुला बैठे हैं।
वाकया आज दोपहर का है। लेकिन इस झगड़े की जड़ में आज सुबह दैनिक जागरण के पटना एडिशन में छपी एक तस्वीर है। नीतीश और जॉर्ज फर्नांडिस के पीछे स्टार न्यूज के पत्रकार प्रकाश कुमार भी मौजूद थे। लेकिन तस्वीर में उनका चेहरा ब्लर कर दिया गया था। इसलिए कि प्रेस क्लब को लेकर दैनिक जागरण के पत्रकारों से उनका झगड़ा हो चुका था। खुन्नस में दैनिक जागरण के उन पत्रकारों ने प्रकाश कुमार से बदला इस ओछे तरीके से लिया।.... READ MORE

Wednesday, July 29, 2009

पान खाओ, नशा करो... खरीद कर पढ़ना मत

एक जमाना था कि खद्दर के झोले में लोग धर्मयुग रखकर बड़े गुमान से चलते थे। लोगों को वह पत्रिका कुछ वैसे ही धर्म (यहां धर्म का मतलब कर्तव्य है) का भान कराती थी, जैसे जामवंत जब तब हनुमान को उनकी शक्ति की याद दिलाते थे। उस पत्रिका को लोग समाज और उसका मानस बदलने का एक सशक्त जरिया मानते थे। अब समाज बदला या नहीं बदला लेकिन धर्मयुग नहीं रहा। आखिर बाजार के युग में धर्म कहां टिकता है? धर्मयुग नही टिकी। धर्मयुग ही क्यों, दिनमान, माया, रविवार जैसी पत्रिकाएं .... READ MORE

अब गूगल की खैर नहीं!

साइबर स्पेस में अब लड़ाई और रोमांचक हो गई है।गूगल कोमाइक्रोसॉफ्ट और याहू ने हाथ मिला लिया है। बुधवार को हुए करार के मुताबिक दोनों मिल कर ऑनलाइन सर्च में गूगल को टक्कर देंगे।
दस साल के लिए हुए इस समझौते में याहू.कॉम अब माइक्रोसॉफ्ट के नए सर्च इंजन बिंग का इस्तेमाल करेगा। दोनों को उम्मीद है कि इससे याहू पर विज्ञापन क्षेत्र की बड़ी कंपनियां आकर्षित होंगी। इस करार से जो भी आमदनी होगी माइक्रोसॉफ्ट उसमें से 88 फीसदी याहू को दे देगा।... READ MORE

संसद में भी बजी टीआरपी की घंटी, मगर क्यों?

राज्य सभा में टेलीविजन के गिरते स्तर पर बहस। बहस में बहुत से सांसदों ने हिस्सा लिया। लेकिन तीन सांसद टीआरपी के विरोध में बहुत ज़्यादा मुखर थे। वो तीनों सांसद हैं - बीजेपी के रविशंकर प्रसाद, कांग्रेस के राजीव शुक्ला और सीपीएम की वृंदा करात। उन्होंने मीडिया की गिरती साख के लिए टैम और उसकी तरफ़ से हर हफ़्ते जारी होने वाले टीआरपी चार्ट को ज़िम्मेदार ठहराया। पूरी बहस और इन सभी की दलीलों को पढ़ने के बाद कुछ और सवाल भी उठते हैं। 1) क्या मीडिया संस्थानों को उनके अपराध के लिए क्लीन चिट देते हुए सिर्फ टैम को ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है? 2) क्या बाज़ारवाद के दौर में बाज़ार के मानकों की अनदेखी की जा सकती है? 3) अगर टैम और टीआरपी खलनायक हैं तो फिर उनका विकल्प क्या होगा? किस चैनल को कितने दर्शक देखते हैं इसका पैमाना क्या होगा? 4) क्या उन सांसदों का मीडिया से जुड़े सवालों को उठाना सही है जिनके घर-परिवार के लोग इस कारोबार से जुड़े हों।
ये सब जानते हैं कि बीएजी फिल्म को राजीव शुक्ला की पत्नी .... READ MORE

Monday, July 27, 2009

...तो भाड़ में जाए ऐसी संस्कृति

अगर आधे घंटे का एक टेलीविज़न शो सदियों पुरानी संस्कृति को उखाड़ फेंक रहा हो, तो भाड़ में जाए ऐसी संस्कृति। ऐसी कमज़ोर और बेबुनियाद संस्कृति, जो हज़ारों साल पुरानी होने का दम भरती हो और दुनिया की सबसे मज़बूत तहज़ीब, सबसे सम्मानित समझी जाती हो।

सच का सामना सिर्फ़ भारत ही नहीं कर रहा, यहां जर्मनी में भी हो रहा है. इंडियन लोगों में चर्चा हो रही है और बहस भी। लेकिन ताज्जुब इस बात पर कि जब सात समंदर पार समोसा और बिरयानी को नहीं भुला पाए, जब अरहर की दाल के बिना दिन का खाना पूरा नहीं होता, तो ख़ुद अपने देश में एक बनावटी और नक़ल किया हुआ शो कैसे तहज़ीब पर ख़तरा बन सकता है। ..... READ MORE

बेरहम सरकार, जंगली विपक्ष

सलीके से सिर ढंकने वाली महबूबा मुफ्ती को संसदीय सलीका नहीं आता। अगर आता तो जम्मू कश्मीर विधानसभा में सोमवार को जो कुछ हुआ, वह नहीं होता। महबूबा इस कदर आपा नहीं खोतीं कि स्पीकर की गरिमा का भी उन्हें खयाल नहीं रहता। वह युवा हैं लेकिन घाटी की एक वरिष्ठ नेता हैं। उनका व्यवहार उनकी पार्टी और प्रदेश की संसदीय राजनीति के लिए एक अनुकरण होना चाहिए, ना कि ऐसा जिसे देखकर किसी भी संजीदा व्यक्ति का मस्तक शर्म से झुक जाए। स्पीकर का माइक खींचना विरोध प्रदर्शन का सौम्य तरीका नहीं हो सकता, जबकि संसदीय परंपरा तो बहुत हद तक मर्यादा और लोक-लाज की पगडंडी से होकर ही गुजरती है। महबूबा के किए पर खिन्न होने का ये कतई मतलब नहीं है कि जम्मू कश्मीर की सरकार जो कुछ शोपियां बलात्कार और हत्या मामले में कर रही है, उसे सही ठहराया जा सकता है। जैसे जैसे 15 अगस्त 1947 से .... READ MORE

करगिल उत्सव ख़त्म, नहीं हुई गंभीर बात

बीते एक सप्ताह में टेलीविजन चैनलों ने एक ख़ौफ़नाक युद्ध को उत्सव बना दिया। और एक अजीब से राष्ट्रप्रेम में करगिल की तथाकथित जीत का ये उत्सव मनाया गया। एक चैनल ने कहा “ज़रा याद करो कुर्बानी” ... दूसरे चैनल से आवाज़ आई... “जां तक लुटा जाएंगे”... तीसरे ने कहा... अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों। जोर-शोर से विजय दिवस मनाया गया और उन शहीदों को याद किया गया। उन शहीदों को मेरी तरफ से भी श्रद्धांजलि। लेकिन ये पूरा उत्सव ख़त्म हो गया, विजय दशमी मना ली गई। और इक्का दुक्का उदाहरणों को छोड़ कर कहीं कोई गंभीर बात नहीं हुई।

करगिल सैनिकों के लिए जीत थी। लेकिन वो युद्ध हुआ तो भारत की नाकामी की वजह से। हमारी सीमा में पाकिस्तानी सैनिक घुस आए और बंकर बना लिये। हमारे पास खुफिया ... READ MORE

लूटपाट, क़त्ल और व्यभिचार के लिए एकजुट हों !

"सच का सामना" के बचाव में कई महारथी मैदान में उतर आए हैं। वीर सांघवी का कहना है कि अगर आपको रिएल्टी टीवी पसंद नहीं तो अपना मत रिमोट से जाहिर कीजिए। चैनल बदल दीजिए। वो भी ऐसा करते हैं इसलिए भारत के तमाम दर्शकों से उनकी अपील है कि वो भी ऐसा ही करें। वीर सांघवी के मुताबिक सच का सामना या फिर ऐसे किसी भी कार्यक्रम को बंद करना सेंसरशिप को बढ़ावा देना है। वो ऐसी किसी भी सेंसरशिप के पक्ष में नहीं।
मीडिया से जुड़ी चर्चित वेबसाइट "एक्सचेंज फॉर मीडिया" पर एक लेख छपा। चार दिन पहले। कोई प्रद्युमन महेश्वरी हैं। मीडिया के बड़े जानकार मालूम होते हैं। उन्होंने सरकार से कहा है कि वो टीवी चैनलों को उनके हाल पर छोड़ दें। वो "सच का सामना" के समर्थन में यहां तक कह देते हैं कि नेताओं की कई हरकतें ऐसी होती हैं जिनसे बच्चों पर बुरा असर पड़ता है। तो क्या उन पर भी पाबंदी लगा दी जाए। यह भी कहते हैं कि सभी चैनलों को इस कार्यक्रम के समर्थन में एकजुट हो जाना चाहिए।

अब आप समझ सकते हैं कि "सच का सामना" के समर्थन में कितने बड़े-बड़े लोग मैदान में उतर आए हैं। इस बीच एक ख़बर यह भी है स्टार प्लस ने इस शो को बचाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। इसके समर्थन में पूरी फौज खड़ी की जा रही है। नए-नए तर्क गढ़े जा रहे हैं। अभिव्यक्ति की आज़ादी और क्रिएटिविटी को सबसे मजबूत ढाल के तौर पर पेश किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि अगर "सच का सामना" रोका गया तो ये रचनात्मकता और अभिव्यक्ति की आज़ादी की हत्या होगी। बचाव की इन दलीलों में कितना दम है इस पर हम विस्तार से चर्चा करेंगे। शुरुआत करते हैं कि आखिर सच का सामना में रचनात्मकता कितनी है और कितनी नहीं? .......... READ MORE

Sunday, July 26, 2009

टाइम का टाइम ख़राब, इकोनमिस्ट की बढ़ी इनकम

ऐतिहासिक मंदी ने दुनिया भर के मीडिया संस्थानों की हालत ख़राब कर दी है। विस्तार की योजनाएं ठप पड़ी हैं। कई बड़ी कंपनियों पर कर्ज का बोझ बेतहाशा बढ़ गया है। बहुत से अख़बार बंद हो चुके हैं। वेबसाइट भी घाटे में हैं। लेकिन इन सब निराशाजनक ख़बरों के बीच द इकोनमिस्ट ने मुनाफा कमाया है। क्यों और कैसे - ये बता रहे हैं बॉन से ओंकार सिंह जनोटी। ओंकार एक ऐसे उभरते हुए पत्रकार हैं जिनमें असीम ऊर्जा है और व्यापक समझ भी। वो इन दिनों जर्मनी के डॉयचे वेलेको अपनी सेवाएं दे रहे हैं।



डिजिटल एज कहे जाने वाले इस दौर में समाचारों में कमी नहीं है. लेकिन दुनिया भर में मशहूर और दिग्गज मानी जाने वाली टाइम और न्यूज़वीक मैग्ज़ीन की हालत ख़स्ता है. विज्ञापन से होने वाली आय के मामले में बीते साल न्यूज़वीक को 27 फीसदी नुकसान हुआ और टाइम को 14 फीसदी तिजोरी ख़ाली देखनी पड़ी. लेकिन पब्लिशर्स इंफार्मेशन ब्यूरो के मुताबिक़ द इकोनमिस्ट मैग्ज़ीन ने न सिर्फ मंदी को पटख़नी दी, बल्कि आमदनी को भी 25 फीसदी बढ़ाया. अमेरिकी और यूरोपीय मीडिया पर बारीक नज़र रखने वाले द एटलांटिक डाट कॉम के कांट्रिब्यूटिंग एडीटर माइकल हाइशोर्न और एडीटोरियल डायरेक्टर बॉब काह्न कहते हैं कि अब वक्त बदल रहा है.... ((READ MORE))

नाम रह जाएगा….

एक मित्र ने बताया कि उनके यहां जीडीए की ओर से एक सफाई कर्मचारी आया था। नाम था रुमाल सिंह। एक भाई ने बताया कि हमारे गांव में एक चचा थे। मोची थे। नाम था कोलंबस। बात चली तो मुझे भी कुछ रोचक नाम याद आ गए।
दोस्तों के साथ बैठे हों, वो भी एनएसडी यानी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के हॉस्टल में, तभी कोई ज़ोर से आवाज़ लगाए- 'प्रशासन..!' क्या लगेगा? शायद किसी नाटक का संवाद बोला जा रहा है या फिर...? पता चला एक साथी एक्टर का नाम है। पूरा नाम है- प्रशासन संरक्षण मल्तियार। पता नहीं कितना सही था लेकिन मेरे चौंकने पर दोस्तों ने बताया कि प्रशासन के घर में और लोगों के नाम भी ऐसे ही - राष्ट्र, राज्य, संविधान, नीति टाइप के हैं। ..... READ MORE

Saturday, July 25, 2009

सबसे पहले तो बंद करो “सच का सामना”

“सच का सामना” बंद होना चाहिए या नहीं - इस पर बहस तेज़ हो रही है। वैसे ऐसे कार्यक्रमों में कोई बुराई नहीं। लेकिन क्या सच में हमारा समाज ऐसे किसी भी सच का सामना करने के लिए तैयार है? शुरुआती कुछ खुलासों से ऐसा नहीं लगता। आप सचिन तेंदुलकर और विनोद कांबली को ही लीजिए। विनोद कांबली ने इस कार्यक्रम के दौरान कह दिया कि सचिन ने उनकी उतनी मदद नहीं की। चाहते तो कर सकते थे। लेकिन नहीं की। बाद में इसका खंडन किया। लगभग गिड़गिड़ाने वाले अंदाज में कहा कि उनकी मंशा ऐसा नहीं थी। लेकिन लोग कांबली की सफ़ाई कबूल करें भी तो कैसे? उन्होंने टीवी पर कांबली को खुद इस सच से पर्दा उठाते देखा। सचिन से रिश्तों में दूरी बढ़ गई। दोनों दोस्त अब दूर हो गए।

यह बात उस दोस्ती की है जिसकी लोग मिसाल दिया करते थे। खेल की दुनिया में लोग उनकी दोस्ती की कसम खाते थे। दोनों को करीब से जानने वाले बताते हैं कि इस घटना ने इतनी दरार पैदा कर दी जिसे भविष्य में पाटना बहुत मुश्किल होगा।


बहुत से लोग.... READ MORE

Friday, July 24, 2009

सोच-समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला

अविनाश ने जो बातें कही हैं, उनमें बहुत दम है। और इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि “अश्लीलता कोई राजनीतिक या सामाजिक (या यहां तक कि निजी) विचारधारा नहीं है। यह हमारी सभ्‍यता की वो सरहद है, जहां कब दीवार खड़ी कर दी गयी, हमें पता ही नहीं चला”। लेकिन अश्लीलता परिभाषित नहीं की जा सके – ऐसा भी नहीं है। इसकी परिभाषा है। ये परिभाषा बहुत हद तक सब्जेक्टिव है। मतलब हमारे समाज में जो अश्लील है, यूरोप के लिए वो श्लील हो सकती है। यूरोप के अलग-अलग देशों में भी ये परिभाषा बदल सकती है। ये भी मुमकिन है कि यूरोप में जो अश्लील मानी जाए जापान में उसे लोग यूं ही नज़रअंदाज कर दें। हर देश के कानून में वहां के सामाजिक परिदृष्य को रख कर अश्लीलता की परिभाषा गढ़ी गई है।

लेकिन सभी जगह अश्लीलता की परिभाषा में कुछ केंद्रीय तत्व हैं। जिनमें सबसे अहम है कि कोई भी रचना साहित्यिक, कलात्मक, राजनीतिक, सामाजिक और वैज्ञानिक मानदंडों पर कहां तक खरी उतरती है। उस रचना की मंशा क्या है और उसके पीछे तर्क क्या है? अगर किसी भी कृति में इनमें से कोई भी तत्व ठोस स्तर पर मौजूद है तो आप उसे सीधे तौर पर अश्लील करार नहीं दे सकते हैं।.... READ MORE

Thursday, July 23, 2009

खजुराहो क्‍या हमारे पर्यटन उद्योग का अश्‍लील पैकेज है?

जनतंत्र पर साथी कबीर ने दो दिन पहले एक लेख लिखानवभारत टाइम्स और दैनिक भास्कर की वेबसाइट पर ख़बरों के रूप में अश्लील साहित्य परोसने का आरोप लगाते हुए कबीर ने सविता भाभी की तरह उन पर प्रतिबंध लगाने का मांग की। आजवरिष्ठ पत्रकार अविनाश ने कबीर के लेख का जवाब दिया है। उन्होंने कहा है कि ये मांग बेतुकी है। साइबर स्पेस में हर किसी का अपना कोना है। दूसरे का कोना छेकने का हक़ किसी को नहीं होना चाहिए। कानून को भी नहीं। आप उनका लेख पढ़िए और उतनी ही बेबाकी से अपनी राय रखिए जितनी बेबाकी से अविनाश ने लिखा है।

----------------------------------------

मुझे मालूम नहीं कि अश्‍लीलता के संदर्भ में विचारधारा का सवाल कितना पारिभाषित है - लेकिन इतना मालूम है कि ऐसे किसी भी व्‍यवहार पर कानूनी पाबंदी है। इसके बावजूद धड़ल्‍ले से अश्‍लील साहित्‍य प्रकाशित होते हैं और बड़े पैमाने पर बिकते हैं। पचास-साठ के दशक में राजकमल चौधरी ने मैथिली में एक नॉविल लिखा था, पाथर फूल। दरभंगा के एक प्रेस से छप रहा था। किसी कर्मचारी ने ..... (READ MORE)

एनडीटीवी को 83.4 करोड़ रुपये का घाटा

एनडीटीवी को इस वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल से जून 2009) में भारी घाटा हुआ है। कंपनी को 130.7 करोड़ रुपये की आमदनी हुई है जबकि खर्च 198 करोड़ रुपये। इसमें ब्याज और दूसरी चीजों को जोड़ने-घटाने के बाद कंपनी को कुल 83.4 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है।

पिछले साल इसी तिमाही की तुलना में आमदनी में करीब 11.28 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई है। जबकि खर्च में 20. 2 करोड़ रुपये की कमी आई है। सबसे अधिक कटौती मार्केटिंग, डिस्ट्रीब्यूशन और प्रमोशन खर्च में हुई है। जबकि प्रोडक्शन खर्च और पर्सनल एक्सपेंसेज में मामूली कमी आई है। नतीजों के मुताबिक कंपनी पर ब्याज का बोझ भी बढ़ा है। ..... (( READ MORE))

साहित्य की दुनिया इतनी ही गंदी है दोस्तों

मैंने ज़िंदगी में डायरी छोड़ कर कुछ नहीं लिखा (सिवाए जनतंत्र पर एक लेख के)। कभी कभार दोस्तों को ई-मेल भेज देता हूं। लेकिन मैं एक अच्छा पाठक जरूर हूं। इसलिए साहित्य की ज़्यादातर बहसों से वाकिफ़ हूं। चाहे वो प्रेमचंद को जातिवादी ठहराने की कोशिश हो या फिर उदय प्रकाश को लेकर चल रहा ताज़ा विवाद। मैं इस विवाद में नहीं कूदना चाह रहा था। लेकिन पाठक को भी अपनी बात कहने का हक़ है। इसी हक़ का इस्तेमाल करते हुए मैं भी अपनी बात कहूंगा। खुल कर कहूंगा।

सबसे पहले तो यह कि उदय प्रकाश ने जो गुनाह किया है उसके लिए उनका बचाव नहीं किया जा सकता। भविष्य में जब भी उदय प्रकाश के इस गुनाह का मूल्यांकन किया जाएगा तो आज जो भी उनके बचाव में खड़े हैं, वो सभी उनके इस गुनाह में बराबर के भागीदार माने जाएंगे। वो जाने-अनजाने में एक ऐसी प्रवृति को जन्म दे रहे हैं जिसमें कोई भी साहित्यकार किसी फासीवादी ... किसी भी दंगाई के गले में बांह डाले घूमेगा और आलोचना करने वालों से कहेगा कि “तुम मेरे कर्म को मत देखो मेरा साहित्य पढ़ो। मैं निजी ज़िंदगी में कुछ भी होऊं तो क्या लेकिन साहित्य में तो साम्यवादी हूं। गरीबों की बात करता हूं... पिछड़ों, दलितों के साथ हूं। तुम मेरे साहित्य की वजह से मुझे चाहते हो... इसलिए मेरे उसी रूप की पूजा करो”। .... READ MORE

Tuesday, July 21, 2009

... तो कलाम नहीं जाते अमेरिका

एपीजे अब्दुल कलाम जैसा सरल-सहज व्यक्तित्व दीया लेकर ढूंढ़ने पर भी नहीं मिलेगा। दिमाग ऐसा कि आने वाली पीढ़ियां उस पर शोध कर सकती हैं लेकिन चेहरे पर वह मासूमियत जो किसी बच्चे में देखी जाती है। भारत को परमाणु शक्ति संपन्न बनाने वाले वैज्ञानिक अब्दुल कलाम, जनता के राष्ट्रपति माने जाने वाले अब्दुल कलाम। सबके लिए इतने प्रिय कि प्यार से लोग उन्हें काका कलाम कहकर पुकारने लगे। उस काका कलाम से अमेरिकी एयर अधिकारियों ने इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर बदसलूकी की।

इसी साल 24 अप्रैल को डॉक्टर कलाम सरकारी यात्रा पर अमेरिका जा रहे थे। उन्हें इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर कॉन्टीनेंटल एयरलाइंस की फ्लाइट संख्या सीओ-083 से न्यूयॉर्क जाना था। तब उस एयरलाइन कंपनी के कर्मचारियों ने सुरक्षा जांच के नाम पर डॉक्टर कलाम की जेब में रखा पर्स और उनका मोबाइल ही नहीं उतरवाया, बल्कि जूते तक खोलवा लिये। कायदे से भारत का पूर्व राष्ट्रपति उस वीआईपी श्रेणी में आता है, जहां उसे ऐसे शक और जलालत की नजर से नहीं देखा जा सकता। लेकिन अमेरिकियों ने किसी दूसरे देश के राष्ट्राध्यक्ष या पूर्व राष्ट्राध्यक्ष का सम्मान करना कब सीखा?.... (READ MORE)

"सविता भाभी" की तरह इन पर भी लगे प्रतिबंध

सविता भाभी पर प्रतिबंध लगा दिया गया। ये एक पोर्न कार्टून साइट है, जिसके चरित्र का नाम है सविता भाभी। कुछ ही दिन में ये वेबसाइट भारत में काफी लोकप्रिय हो गई थी। इतनी कि दुनिया के सबसे अधिक “नैतिक राष्ट्र” में नैतिकता का सवाल उठ खड़ा हुआ। इंटरनेट पर ऐसी हज़ारों पोर्न वेबसाइट भारत में धड़ल्ले से खुलती हैं। साइबर कैफे में लोग घंटों ऐसी वेबसाइटों पर चिपके रहते हैं। लेकिन नैतिकता का सवाल सिर्फ़ और सिर्फ़ सविता भाभी नाम की साइट पर उठा। सरकार भी तुरंत हरकत में आई और उसने इस पर प्रतिबंध लगा दिया। अब ये साइट भारत में नहीं खुलती है।
ये एक ऐसी वेबसाइट थी, जो खुलेआम दावा करती थी कि वो पोर्न कार्टून वेबसाइट है। लेकिन यहां तो कई अख़बार अपने पन्नों पर और अपनी वेबसाइट पर वैसा ही अश्लील मसाला देते हैं, ..... (READ MORE)




Saturday, July 18, 2009

जब नंगी तस्वीरों से काम चले तो ख़बर कौन पूछे?


हिंदी मीडिया की मौजूदा हालत के लिए आखिर कौन-कौन जिम्मेदार हैं? जनतंत्र पर इस सवाल से जुड़ी एक बहस चल रही है। हमने उदयन शर्मा की याद में हुए संवाद के बहाने इस मुद्दे पर कुछ सवाल उठाए थे। फिर प्रोफेसर आनंद कुमार का वो लेख छापा जिनमें कई सवालों के जवाब थे। अब उसी बहस को आगे बढ़ा रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह। जनसत्ता से संजय कुमार सिंह का गहरा नाता रहा है। उन्होंने इस अख़बार को 1987-2002 तक पंद्रह साल दिये हैं। अब वो अनुवाद के जरिए अपनी जीविका चला रहे हैं। बीते कुछ वर्षों में आर वेंकटरमन की पुस्तक "माइ प्रेसिडेंशियल इयर", एन के सिंह की "द प्लेन ट्रूथ", जे एन दीक्षित की "इंडो पाक रिलेशन" और लेफ्टिनेंट जनरल एस के सिन्हा की "वीर कुंवर सिंह" समेत बीस से ज़्यादा चर्चित पुस्तकों का वो अनुवाद कर चुके हैं। आप जनतंत्र पर उनका ये लेख पढ़िए और हिंदी पत्रकारिता की दशा-दिशा पर चल रही बहस को आगे बढ़ाइए।

................

हिन्दी पत्रकारिता की दशा दिशा पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। एक समय हिन्दी के मानक कहे गए अखबार जनसत्ता का हवाला देकर बातें तो की जा सकती हैं पर उसका कोई मतलब नहीं है। अगर यह तथ्य है कि अटल बिहारी वाजपेयी हिन्दी अखबारों के मुकाबले अंग्रेजी वालों को ज्यादा महत्त्व देते रहे तो इसका मतलब है और ऐसा क्यों है यह समझना कोई मुश्किल नहीं है और इसके लिए अगर कोई दोषी है तो वो हम ही हैं। इनमें पत्रकार, संपादक, मालिक सलाहकार सब की भागीदारी है। हिन्दी और अंग्रेजी के अखबारों, पाठकों, पत्रकारों, मालिकानों ..... READ MORE

पाठकों को धोखा दे रहा है “हिंदुस्तान”

"हिंदुस्तान" के कुछ फैसले चौंकाने वाले होते हैं। उन्हें "सामान्य समझ" रखने वाले पाठक नहीं समझ सकेंगे। जैसे मैं नहीं समझ पा रहा हूं। इसके लिए शायद कुछ "ज़्यादा ज्ञान" की जरूरत हो जो मुझमें नहीं है। लेकिन एक पाठक होने के नाते मुझे ये पूरा हक़ है कि अपनी नादानी की वजह से ही जो मेरे मन में सवाल उठ रहे हैं उन्हें सबके सामने जाहिर करूं। बीते दो दिन में हिंदुस्तान ने दो बड़े फ़ैसले लिये। बाकी तमाम हिंदी अख़बारों से अलग फ़ैसले लिए। किस मंशा से... किन वजहों से... सही-सही तो वहां के संपादक ही बता सकेंगे। हम और आप बस एक विश्लेषण कर सकते हैं।

शुरुआत करेंगे हिंदुस्तान के दूसरे फ़ैसले से। यानी आज के फ़ैसले से। आज हिंदुस्तान में फ्रंट पेज से मेट्रो पर सीएजी की रिपोर्ट...... ((READ MORE))

Friday, July 17, 2009

नवभारत टाइम्स को तगड़ा झटका, मधुसूदन आनंद का इस्तीफ़ा

मधुसूदन आनंद ने नवभारत टाइम्स के को-एक्जीक्यूटिव एडिटर के पद से इस्तीफा दे दिया है। वो बीते कुछ समय से अपने अधिकारों में कटौती को लेकर थोड़ा दुखी थे। सूत्रों के मुताबिक मधुसूदन जल्दी ही किसी दूसरे मीडिया संस्थान में शामिल होंगे। वो मीडिया संस्थान कौन सा है और मधुसूदन किस पद पर जा रहे हैं अभी ये खुलासा नहीं हुआ है।
नवभारत टाइम्स में मधुसूदन आनंद बीते डेढ़ दशक से सक्रिय भूमिका निभा रहे थे। लेकिन बीते एक साल में अपने अधिकारों में कटौती को लेकर थोड़ा खिन्न चल रहे थे। करीब बारह साल पहले सूर्यकांत बाली के जाने के बाद से नवभारत टाइम्स को दो स्तंभ रहे हैं।
समाचार पक्ष रामकृपाल सिंह के हवाले रहा तो विचार पक्ष मधुसूदन आनंद के जिम्मे। कुछ साल पहले जब... READ MORE

Thursday, July 16, 2009

"जनसत्ता" और उसकी ये "महान" खोजी पत्रकारिता

जनसत्ता में बुधवार को एक बहुत बड़ी ख़बर छपी। उसका हेडर था "कई गंभीर खामियों से भरी हुई है मेट्रो"। इसमें कहा गया है कि "दिल्ली मेट्रो रेल की निर्माणाधीन लाइनें ही नहीं बल्कि इसकी चालू लाइन भी खतरे से खाली नहीं है। मेट्रो की लाइन नंबर दो की पटरियां (लोहे का ढांचा जिस पर ट्रेन चलती है) में जगह-जगह गड्ढे हो गए हैं जो कभी भी किसी गंभीर घटना को अंजाम दे सकते हैं"। अगर ये ख़बर सही है तो श्रीधरन और मेट्रो पर बहुत बड़ी लापरवाही का मामला बनता है। उनके ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर मुहिम चलाने की ज़रूरत है। मेट्रो के ख़िलाफ़ तुरंत कार्रवाई के लिए दबाव बनाने की ज़रूरत है। उसे एक साथ हज़ारों लोगों की ज़िंदगियों को ख़तरे में डालने की छूट नहीं दी जा सकती। किसी कीमत पर नहीं दी जा सकती।

Monday, July 13, 2009

हिंदी पत्रकारिता के नाम दो मिनट का मौन

उदयन शर्मा की याद में हुए संवाद में शरद यादव ने अहम मुद्दा उठाया। वो सभा के आखिर में बोले इसलिए उनकी बात आगे नहीं बढ़ सकी। लेकिन उन्होंने जो मुद्दा उठाया, उस पर व्यापक बहस होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि सभा में वो लोग नहीं पहुंचे जो फैसले करते हैं। उन्होंने कहा कि कपिल सिब्बल ही नहीं देश के तमाम हुक्मरान हिंदी अख़बारों को दोयम नज़रिये से देखते हैं और अंग्रेजी अख़बारों को लेकर सम्मोहित हैं। उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी का उदाहरण देकर कहा कि वो जब प्रधानमंत्री थे हर सुबह अंग्रेजी अख़बारों को जितना ध्यान देकर पढ़ते थे और उनकी ख़बरों को जितना अहमियत देते थे, उन्होंने हिंदी अख़बारों को वो अहमियत कभी नहीं दी। ये ऐसे प्रधानमंत्री की बात थी जिन्होंने हमेशा हिंदी भाषी क्षेत्रों से राजनीति की। जो हमेशा हिंदी भाषी क्षेत्रों से चुने गए। जिन्हें हिंदी का बड़ा वक्ता गिना गया और जो खुद को हिंदी का कवि बताते रहे। आखिर क्यों? हिंदी के पत्रकार वो सम्मान हासिल नहीं कर सके जो अंग्रेजी के पत्रकारों को मिला? हिंदी समेत तमाम भारतीय भाषाओं के पत्रकारों की इस स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है? क्या सिर्फ़ सरकार को इसके लिए जिम्मेदार ठहाराया जा सकता है या फिर कहीं न कहीं इसके लिए “हम” खुद भी जिम्मेदार हैं. “हम” मतलब हिंदी समेत भारतीय भाषाओं के तमाम पत्रकार और संपादक।.... ((READ MORE))

Sunday, July 12, 2009

नेताओं और पत्रकारों की छींटाकशी में छूट गए मुद्दे

दिल्ली के कंस्टीट्यूशन क्लब में शनिवार को उदयन शर्मा फाउंडेशन ट्रस्ट की तरफ से संवाद 2009 का आयोजन किया गया। इस मौके पर कपिल सिब्बल, शरद यादव, सीताराम येचुरी, कुलदीप नैयर, राहुल देव, संतोष भारतीय, नीलाभ मिश्रा, आशुतोष, पुण्य प्रसून वाजपेयी, कुर्बान अली, पंकज पचौरी समेत कई दिग्गज पत्रकार और नेता जमा हुए। सभी ने मीडिया की मौजूदा स्थिति पर जो कुछ कहा उससे मोटे तौर पर कुछ निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। पहला, हाल के दिनों में जो धत्तकर्म हुए हैं उनसे मीडिया की साख बहुत घटी है। दूसरा, घटती साख से पत्रकारों का एक धड़ा बेचैन है। तीसरा, पत्रकारों का एक वर्ग ऐसा भी जो अपनी ठसक में अब भी व्यापक बहस के लिए तैयार नहीं है। चौथा, लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की घटती साख से बाकी तीन स्तंभ अधिक निरंकुश हो गए हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो कपिल सिब्बल ने ये नहीं कहा होता कि आप कुछ भी लिखते रहें, हमें फर्क नहीं पड़ता।.... ((READ MORE))

Saturday, July 11, 2009

मीडिया में “मायावती” और “कांशी राम” क्यों नहीं हैं?

सियासत में सम्मानजनक स्थान हासिल कर चुकी पिछड़ी जातियों और दलितों के नुमाइंदे
मीडिया में वो मुकाम हासिल नहीं कर सके हैं। आखिर क्यों? क्या ये उनकी नाकामी है।
नहीं। ये उनकी नाकामी कतई नहीं… ये तो अगड़ों की साज़िश है। आप वरिष्ठ
पत्रकार अनिल चमड़िया
का ये लेख पढ़ें और सदियों से चली आ रही इस साज़िश
को करीब से समझें। भारतीय मीडिया के जातिवादी और सामंती चेहरे को करीब से देखें।

........................................

सुशील का फोन आया ‘सर आज भी नेशनल एडिशन में पहले पन्ने पर बाई लाइन स्टोरी लगी है। ये चौथी है सर! पहले भी नेशनल एडीशन में तीन स्टोरी लगी थी। एक तो लीड भी बनी थी सर! सुशील बहुत खुश था। वह उत्तर प्रदेश के उस पिछड़े जिले से स्थानीय संस्करण के लिए बाई लाइन खबरें तो ढेरों निकाल लेता है, साथ ही उसने कई ऐसी स्टोरी की हैं जिन्हें कई संस्करणों में निकलने वाले समाचार पत्र ने बहुत ही प्रमुखता से छापा है। सुशील देश में पत्रकार तैयार करने वाले बेहतरीन ब्रांड के संस्थान से निकला है। वह अपनी कक्षा में पहला छात्र था जिसकी चिट्ठी ने पाठकों के पत्रों के बीच अपनी जगह बनाई थी। उसने जनसत्ता के संपादक को एक दिन समाचार पत्र में छपी कुछ गलतियों को सुधारने के लिए एक चिट्ठी लिखी थी। संपादक ने उसे धन्यवाद पत्र भी भेजा था। .....((read more))

Thursday, July 9, 2009

मीडिया की आधी आबादी का सच

“अंग्रेजी पत्रकार की जिन बातों को हिंदी पत्रकार उसके गुण बताते, उन्हीं बातों को वे अपनी सहकर्मी के चरित्र हनन का औजार बना लेते। मसलन, अंग्रेजी पत्रकार बोले तो तेज-तर्रार और अपनी सहकर्मी बोले तो बदतमीज। अंग्रेजी पत्रकार अपने हकों के लिए लड़े तो जुझारू और हिंदी पत्रकार का आवाज़ उठाना शोशेबाजी। इस तरह की अनेक त्रासदियां महिला पत्रकार को जाने-अनजाने झेलनी पड़ती। महिला पत्रकार के साथ एक कप चाय पीकर धन्य हो जाने वाले साथी उसके प्रमोशन की बात उठते ही बैरी बन जाते हैं।” वरिष्ठ पत्रकार इरा झा ने अपनी ज़िंदगी के कुछ अनछुए पन्नों को सामने रख कर कई बड़े सवाल उठाए हैं। ये सिर्फ़ उनका सच नहीं बल्कि हिंदी पत्रकारिता से जुड़ी तमाम महिलाओं का है जिन्हें हर रोज मर्दों की बनाई इस दुनिया में अपने हक़ की लड़ाई लड़नी पड़ती है। ये वो सच है जिससे हम और आप नज़रें तो चुरा सकते हैं, लेकिन उसे झुठला नहीं सकते। इरा झा की ये दास्तान सामयिक वार्ता के मीडिया विशेषांक से साभार आपके सामने है… आप पढ़िए और बताइए कि क्या ये सच नहीं है?
---------------------
ज़मींदारों और जजों के खानदान की इस लड़की के पत्रकार बनने की कहानी कोई तीन दशक पुरानी है। भारत सरकार में संयुक्त सचिव अपने पिता के साथ छत्तीसगढ़ के दुर्ग से दिल्ली पहुंचकर इस महानगर की नब्ज भांपने की कोशिश कर रही थी कि एक दिन सड़क पार भारतीय जनसंचार संस्थान जाना हो गया। तब ये संस्थान साउथ एक्सटेंशन यानी मेरे आवास के पास था। वहां दिल्ली पाठ्यक्रम के निदेशक डॉ. रामजीलाल जांगिड़ मिल गए। उनसे मिलकर अपनी लिक्खाड़ तबियत और समसामयिक विषयों में दिलचस्पी के बारे में बताया तो बोले- एक कार्यशाला होने वाली है, खेल पत्रकारिता पर। उसमें क्यों नहीं शामिल हो जाती? मैं डेढ़ सौ रुपये देकर ..... ((READ MORE))

“हिंदुस्तान” का अंधविश्वास

“हिंदुस्तान” अंधविश्वास की गिरफ़्त में है और उसमें आए दिन कई ऐसी ख़बरें छपती हैं जिनसे अंधविश्वास को बढ़ावा मिलता है। श्रीलंका के गृहयुद्ध के दौरान सबने देखा कि किस तरह वहां हेडलाइन दी गई श्रीलंका में एक और लंका कांड। बिना सोचे-समझे प्रभाकरण की तुलना रावण से की गई और लगा कि श्रीलंकाई राष्ट्रपति राम से कम नहीं।
अब आप वहां छपी एक और ख़बर पर नज़र डालिए। इसे 12वें पन्ने पर बड़ी प्राथमिकता से छापा गया है। .... ((READ MORE))

Thursday, July 2, 2009

जरनैल को नौकरी से निकाला गया

पत्रकार जरनैल सिंह को हटा दिया गया है। जरनैल सिंह दैनिक जागरण में रक्षा मामलों से जुड़ी ख़बरें दिया करते थे। वो चुनाव से पहले उस वक़्त सुर्खियों में आए जब उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में गृह मंत्री पी चिदंबरम पर जूता उछाल दिया था। वो सिख विरोधी दंगों के आरोपी जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार को कांग्रेस की तरफ से टिकट दिए जाने से नाराज़ थे।

जरनैल सिंह ने 7 अप्रैल को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार को सीबीआई की तरफ से क्लीन चिट दिये जाने पर चिदंबरम से सवाल पूछा। चिदंबरम ने जवाब दिया लेकिन उससे जरनैल सिंह संतुष्ट नहीं हुए।
.... ((read more)) ....

जरैनल सिंह को दी गई चिट्ठी


Tuesday, June 30, 2009

पुष्पेंद्र से इस्तीफ़े की मांग, क्लब में घोटाले का आरोप

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में हंगामे के बाद अब जनरल सेक्रेटरी पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ को हटाने की मांग जोर पकड़ने लगी है। प्रेस क्लब के कुछ पुराने मेम्बर और पदाधिकारी पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ को हटाने के लिए हस्ताक्षर अभियान शुरू कर रहे हैं। उनका आरोप है कि प्रेस क्लब में गैर कानूनी काम चल रहा है और बड़े पैमाने पर धांधली हो रही है। इसे रोकने के लिए उन्होंने मौजूदा कमेटी को तुरंत भंग करने और निष्पक्ष जांच की मांग की है।
प्रेस क्लब के मौजूदा ट्रेजरार नदीम अहमद काजमी के मुताबिक शुरुआती “चंद हफ़्तों को छोड़ दिया जाए तो उसके बाद लेन-देन के किसी भी दस्तावेज पर उनके हस्ताक्षर नहीं मिलेंगे। ऐसा इसलिए कि प्रेस क्लब के जनरल सेक्रेटरी पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ सारे लेन-देन अपने ही हस्ताक्षर से करते हैं।” उनका ये आरोप भी है कि ... ((READ MORE))

Monday, June 29, 2009

घुसपैठ के बाद दिल्ली के प्रेस क्लब में पहुंची पुलिस

दिल्ली में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में इन दिनों जो कुछ हो रहा है वैसा क्लब के इतिहास में कभी नहीं हुआ। रविवार की घटना से आप प्रेस क्लब की हालत का अंदाजा लगा सकते हैं। साथ ही मीडिया के एक खराब पहलू को भी जान और समझ सकते हैं। ये भी कि पत्रकारिता के इस पवित्र पेशे में किस हद तक सड़ांध हो गई है। जो बेहद छोटे लाभ के लिए गुणा-गणित में जुटे हों वो समाज और देश के बारे में कैसे सोचेंगे।

रविवार, 28 जून 2009 को दिल्ली के प्रेस क्लब में पुलिस दाखिल हुई। मामला प्रेस क्लब में घुसपैठ का था। चश्मदीदों के मुताबिक वहां करीब 11 बजे एक कपूर नाम का शख़्स करीब 40-45 लोगों के साथ दाखिल हुआ। ... ((READ MORE))

न्यूज़ एक्स में क़त्लेआम

न्यूज़ एक्स में बड़े पैमाने पर छंटनी कर दी गई है। छंटनी की प्रक्रिया शनिवार को शुरू हुई और अभी तक की रिपोर्ट के मुताबिक 48 लोगों को पिंक स्लिप पकड़ाया जा चुका है। आज भी कई लोगों को चिट्ठियां बांटी गई हैं और सूत्रों के मुताबिक कुल मिला कर 70 से ज़्यादा लोगों को हटाया जाना है।

न्यूज़ एक्स में करीब सभी महकमों में अहम पदों पर तैनात लोगों पर गाज गिरी है। पॉलिटिकल एडिटर .... ((READ MORE))

Sunday, June 28, 2009

पीएम की मस्ती, पीएम का मीडिया

भारत ही नहीं पूरी दुनिया में मीडिया को मैनुपुलेट किया जाता है। मीडिया चाहे तो किसी नायक को एक पल में खलनायक बना दे और किसी खलनायक को नायक। इटली में भी इन दिनों कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है। वहां के प्रधानमंत्री बार्लुस्कोनी सेक्स स्कैंडल में फंसे हैं। विरोधी पार्टियां जांच के लिए दबाव डाल रही हैं तो दूसरी तरफ बार्लुस्कोनी अपने न्यूज़ चैनलों की मदद से बचाव में जुटे हैं। इससे पहले भी बार्लुस्कोनी कई बार संगीन आरोपों में फंस चुके हैं, लेकिन हर बार मीडिया के इस्तेमाल और अपनी चतुराई से वो बचते रहे हैं। यूरोप से पूरा ब्योरा दे रहे हैं साथी पत्रकार अनवर जे अशरफ़।



इटली के प्रधानमंत्री सिल्वियो बार्लुस्कोनी यूरोप के शायद सबसे विवादित राष्ट्राध्यक्ष हैं. यूं तो बार्लुस्कोनी 72 साल के हैं लेकिन अनगिनत सेक्स स्कैंडलों में फंसे हैं. उन पर प्रधानमंत्री रहते हुए नाबालिग़ लड़की से रिश्ते रखने से लेकर कॉल गर्ल के साथ रात बिताने तक के आरोप हैं. भ्रष्टाचार, टैक्स चोरी और माफ़िया से रिश्तों का आरोप अलग. सवाल यह उठता है कि इतने आरोपों के बाद वह पद पर कैसे बने हैं. शायद मीडिया में उनका दख़ल सबसे बड़ी वजह है. बार्लुस्कोनी एक कुशल राजनेता के साथ साथ इटली के अरबपति कारोबारी भी हैं और देश के मीडिया बाज़ार का बहुत बड़ा हिस्सा उनकी कंपनी चला रही है.
कॉल गर्ल से जुड़ा ताज़ा क़िस्सा ही लीजिए. आरोप है कि बार्लुस्कोनी के आलीशान घर पर पार्टी हुई, जिसमें मोटी फ़ीस पर महंगी कॉल गर्ल शामिल हुई. मामला सामने आने के बाद प्रधानमंत्री इनकार तो नहीं कर पाए लेकिन सधे सधाए मीडिया के ज़रिए सफ़ाई ज़रूर पेश कर दी. अपने ही अख़बार को .... ((READ MORE))

Saturday, June 27, 2009

“एसपी को खरीदने की हैसियत किसी में नहीं थी”

दिल्ली के प्रेस क्लब में आज एसपी सिंह को याद किया गया। इस मौके पर बड़ी संख्या में पत्रकार जुटे। कुछ उनके दोस्त। कुछ उनके साथ काम कर चुके पत्रकार जो आज अहम ओहदों पर हैं। कुछ युवा पत्रकार जो इस पेशे में चंद कदम ही चले हैं। कुछ ऐसे भी जिन्हें अभी पहला कदम रखना है। सबने एसपी सिंह के बहाने पत्रकारिता के मौजूदा माहौल पर चर्चा की।
आईबीएन-7 के मैनेजिंग एडिटर आशुतोष ने कहा कि एसपी ने हिंदी पत्रकारिता को एक कुंठा से बाहर निकाला और उसे पेशेवर बनाया। उन्होंने बताया कि एसपी के दौर से पहले हिंदी का पत्रकार कुंठा में जी रहा था। वो अंग्रेजी के पत्रकारों को अपने से ऊपर मानता था। शायद इसलिए क्योंकि सत्ता के गलियारे में उनकी सुनी जाती थी। हिंदी के पत्रकारों की नहीं। लेकिन एसपी ने अपने तरीके से हिंदी और अंग्रेजी पत्रकारों के बीच खिंची दीवार गिरा दी। “आज तक” के जरिए साबित किया कि हिंदी के पत्रकार किसी से कम नहीं हैं और उनकी आवाज़ को कोई अनसुनी नहीं कर सकता। आशुतोष ने ये भी कहा कि एसपी ने हिंदी पत्रकारिता को.... ((READ MORE))

Thursday, June 25, 2009

क्या मीडिया का काम सिर्फ़ उन्माद फैलाना है?

दस दिन तक केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम और पश्चिम बंगाल सरकार के सुर में सुर मिलाने के बाद अब अख़बारों का जोश भी ठंडा पड़ गया है। बीते दस दिनों में उन्होंने खूब उन्माद फैलाया। लालगढ़ में सैन्य कार्रवाई के समर्थन में जोरदार हवा बनाई। लगा कि उनकी ललकार सुनकर कोबरा फोर्स के जवान एक दिन के भीतर ही सारे माओवादियों का सफाया कर देंगे और लालगढ़ को उनके चंगुल से छुड़ा लेंगे।

19 जून को जब कोबरा फोर्स ने लालगढ़ में प्रवेश किया तो अगले दिन सारे अख़बारों की सुर्खियों में उन्मादी राष्ट्रवाद झलक रहा था। कोबरा फोर्स ने कसा लालगढ़ पर शिकंजा – जैसी सुर्खियों का लब्बोलुबाब यही था कि फोर्स के जवानों की गोलियों से माओवादियों को कोई नहीं बचा सकता। इस कवरेज में एक बात और चिंताजनक थी। लगभग सभी अख़बारों ने माओवादियों को घृणित अपराधी की तरह पेश करते हुए कहा कि उन्होंने महिलाओं और बच्चों को आगे कर दिया है। वो इनका इस्तेमाल ढाल की तरह कर रहे हैं। मतलब अगर कर्ण का वध करना है तो सबसे पहले उसका कवच ..... ((READ MORE))