Tuesday, June 9, 2009
इस ख़बर की मंशा क्या है?
एनसीआर में अरावली में खनन पर रोक सही है या ग़लत? अगर किसी को पर्यावरण की ज़रा सी भी समझ होगी तो वो सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले को सही ठहरायेगा। लेकिन हमारे कुछ संपादक ऐसा नहीं मानते। अब आप सोमवार को दैनिक हिंदुस्तान के बॉटम एंकर को देखिये। ख़बर की हेडिंग है … “जान देकर चुकानी पड़ रही है पत्थर की कीमत”… इस ख़बर का एंकर इंट्रो पढ़िये, आप कहानी खुद ब खुद समझ जाएंगे। ((read more))
Sunday, June 7, 2009
यह नई पत्रकारिता है जी
((वर्तमान में मीडिया के दो चेहरे हैं। मुखौटा हटाने पर नज़र आने वाला असली चेहरा इतना विकृत है कि सिर शर्म से झुक जाता है। इस चुनाव में मीडिया ने ख़ासकर दैनिक जागरण जैसे कुछ संस्थानों ने दलाली का एक नया इतिहास रचा है। लोकतंत्र का सौदा कर उन्होंने अपने कर्म और धर्म दोनों से किनारा कर लिया और पाठकों को धोखा दिया है। इस पर भी उनकी बेशर्मी का आलम ये है कि वो खुलेआम जनता के साथ होने का दंभ भर रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी ने इस हफ़्ते जनसत्ता में उनकी इसी बेशर्मी को सामने रखा है। साथ ही सूचना के अधिकार की वकालत करने वाले अरविंद केजरीवाल और अरुणा राय से पूछा है कि आखिर किस सिद्धांत के तहत वो ऐसे अख़बारों के साथ खड़े हैं जिन्होंने सूचना के अधिकार को ताक पर रख दिया। ये विरोधाभाष क्यों? ये साठगांठ क्यों?))
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वे जब सूचना के जन अधिकार अभियान के कार्यकर्ता हुआ करते थे तो अरविंद केजरीवाल से मिलना जुलना होता था। फिर जब सूचना के अधिकार का कानून बन गया तो केजरीवाल ने दिल्ली जैसे महानगर में काम करने के लिए “परिवर्तन” नाम की संस्था बनाई। गांवों में काम करने वाले लोगों से सीधे मिलने और बात की बात से प्रचार करके काम चला सकते हैं। महानगर में मीडिया की सहायता के बिना लोगों तक पहुंचा नहीं जा सकता। केजरीवाल ने इसलिए दिल्ली के मीडिया से संबंध बनाए और उससे मिले सहयोग के कारण उनके काम का असर भी हुआ। भले लोगों की सिफारिश पर उन्हें मेग्सेसे भी मिल गया। अब वे सूचना के अधिकार आंदोलन के नेता हो गये। अब वे पब्लिक कॉज रिसर्च फाउंडेशन के जरिये सूचना के अधिकार को बढ़ाने वाले लोगों को राष्ट्रीय पुरस्कार देने वाले हैं।
अच्छा है। लेकिन इससे अपने को उत्तेजित होने की जरूरत नहीं थी। यह कागद कारे इसलिए लिख रहा हूं कि अरविंद केजरीवाल ने यह पुरस्कार तय करने के लिए जो समिति बनाई है, उसमें ऐसे अखबार और उसके मालिक संपादक को भी रखा है, जिसने इस लोकसभा चुनाव में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार किया। भ्रष्टाचार तो हिंदी इलाके के और भी बल्कि देश भर के अखबारों ने किया। पैसे लेकर उम्मीदवारों के प्रचार को खबर बनाकर छापा और पाठकों को बताया तक नहीं कि ये खबरें उनकी नहीं, उम्मीदवार के प्रचार के विज्ञापन हैं। उम्मीदवारों को अपना खर्च सीमा में रखने और काले पैसे से मनचाहा प्रचार पाने की सुविधा हुई। चुनाव कवरेज के लिए हिंदी इलाके में घूमने वाले समझदार और जानकार पत्रकारों का अंदाज है कि उत्तर प्रदेश के इस अखबार ने इस चुनाव में कोई दो सौ करोड़ रुपये का काला धन बनाया है। ....... ((READ MORE))....
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वे जब सूचना के जन अधिकार अभियान के कार्यकर्ता हुआ करते थे तो अरविंद केजरीवाल से मिलना जुलना होता था। फिर जब सूचना के अधिकार का कानून बन गया तो केजरीवाल ने दिल्ली जैसे महानगर में काम करने के लिए “परिवर्तन” नाम की संस्था बनाई। गांवों में काम करने वाले लोगों से सीधे मिलने और बात की बात से प्रचार करके काम चला सकते हैं। महानगर में मीडिया की सहायता के बिना लोगों तक पहुंचा नहीं जा सकता। केजरीवाल ने इसलिए दिल्ली के मीडिया से संबंध बनाए और उससे मिले सहयोग के कारण उनके काम का असर भी हुआ। भले लोगों की सिफारिश पर उन्हें मेग्सेसे भी मिल गया। अब वे सूचना के अधिकार आंदोलन के नेता हो गये। अब वे पब्लिक कॉज रिसर्च फाउंडेशन के जरिये सूचना के अधिकार को बढ़ाने वाले लोगों को राष्ट्रीय पुरस्कार देने वाले हैं।
अच्छा है। लेकिन इससे अपने को उत्तेजित होने की जरूरत नहीं थी। यह कागद कारे इसलिए लिख रहा हूं कि अरविंद केजरीवाल ने यह पुरस्कार तय करने के लिए जो समिति बनाई है, उसमें ऐसे अखबार और उसके मालिक संपादक को भी रखा है, जिसने इस लोकसभा चुनाव में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार किया। भ्रष्टाचार तो हिंदी इलाके के और भी बल्कि देश भर के अखबारों ने किया। पैसे लेकर उम्मीदवारों के प्रचार को खबर बनाकर छापा और पाठकों को बताया तक नहीं कि ये खबरें उनकी नहीं, उम्मीदवार के प्रचार के विज्ञापन हैं। उम्मीदवारों को अपना खर्च सीमा में रखने और काले पैसे से मनचाहा प्रचार पाने की सुविधा हुई। चुनाव कवरेज के लिए हिंदी इलाके में घूमने वाले समझदार और जानकार पत्रकारों का अंदाज है कि उत्तर प्रदेश के इस अखबार ने इस चुनाव में कोई दो सौ करोड़ रुपये का काला धन बनाया है। ....... ((READ MORE))....
Saturday, June 6, 2009
क्या तानाशाह बनना चाहती हैं मायावती?
उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती अब तानाशाही रवैया अख़्तियार कर रही हैं। उनकी सरकार ने एक अध्यादेश के जरिये सूचना के अधिकार में कटौती कर दी है। ये सोचे समझे बगैर कि उनके इस कदम से सबसे ज़्यादा नुकसान हाशिये पर मौजूद लोगों को ही होगा। ये अधिकार ताक़तवर लोगों के संक्षरण के लिए नहीं बल्कि उन लोगों को ताक़तवर बनाने के लिए है जिन्हें हमेशा छला जाता रहा है।
उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने गुपचुप तरीके से एक अध्यादेश जारी किया है। इस अध्यादेश के मुताबिक सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करने पर भी सूबे के मंत्रियों, विधायकों और सांसदों के आचार व्यवहार के बारे में कोई जानकारी नहीं दी जाएगी। इसमें सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि मंत्रियों और सांसदों के ख़िलाफ़ शिकायतों से जुड़ी जानकारी और जांच का ब्योरा ..... ((READ MORE))
उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने गुपचुप तरीके से एक अध्यादेश जारी किया है। इस अध्यादेश के मुताबिक सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करने पर भी सूबे के मंत्रियों, विधायकों और सांसदों के आचार व्यवहार के बारे में कोई जानकारी नहीं दी जाएगी। इसमें सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि मंत्रियों और सांसदों के ख़िलाफ़ शिकायतों से जुड़ी जानकारी और जांच का ब्योरा ..... ((READ MORE))
Friday, June 5, 2009
दाऊद से जुड़ी अफ़वाह भी बिकती है
अंडरवर्ल्ड सरगना दाऊद इब्राहिम से जुड़ी हर ख़बर बिकती है। यहां तक की अफ़वाह भी। शुक्रवार को भी न्यूज़ चैनलों पर दाऊद और उसके भाई अनीस इब्राहिम के नाम पर एक ड्रामा दिन भर चला। प्रश्नचिन्ह (?) और विस्मय बोधक चिन्ह (!) लगा कर सनसनी फैलाई जाती रही। चीख-चीख कर कहा गया कि कराची में एक हमले में अनीस इब्राहिम बुरी तरह घायल है और दाऊद को भी गोलियां लगी हैं। सनसनी फैलाने में सभी चैनल जुटे थे। कुछ चैनल थोड़ा एहतियात के साथ ख़बर बेच रहे थे जबकि कुछ तो एक तरीके से ख़बर की पुष्टि करते नज़र आए।
चर्चा आगे बढ़ाने से पहले कुछ ब्रेकिंग न्यूज़ के कुछ वाक्यों पर नज़र डालिये। अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद का भाई अनीस बुरी तरह घायल!… कराची में हुए हमले में अनीस घायल? … अनीस को लगी 12 गोलियां… कराची में मारी गई गोलियां… एटीएम के बाहर मारी गईं गोलियां… गोलीबारी में दाऊद भी जख़्मी! …. बलूच गिरोह ने मारी गोलियां… एक अख़बार के हवाले से ख़बर…. डी कंपनी में हड़कंप ..... ((READ MORE))
चर्चा आगे बढ़ाने से पहले कुछ ब्रेकिंग न्यूज़ के कुछ वाक्यों पर नज़र डालिये। अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद का भाई अनीस बुरी तरह घायल!… कराची में हुए हमले में अनीस घायल? … अनीस को लगी 12 गोलियां… कराची में मारी गई गोलियां… एटीएम के बाहर मारी गईं गोलियां… गोलीबारी में दाऊद भी जख़्मी! …. बलूच गिरोह ने मारी गोलियां… एक अख़बार के हवाले से ख़बर…. डी कंपनी में हड़कंप ..... ((READ MORE))
Thursday, June 4, 2009
मनमोहन सरकार का मीडिया मैनेजमेंट
कुछ दिन पहले ही एक्सचेंज फॉर मीडिया पर इस साल जनवरी से मार्च के बीच टॉप टेन एडवरटाइजर्स यानी विज्ञापन देने वाली कंपनियों और संस्थाओं की सूची छापी गई। उस सूची में एक बात चौंकाने वाली थी। मंदी के इस दौर में मनमोहन सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों ने अख़बारों के लिए खजाना खोल दिया था। टॉप टेन एडवरटाइजर्स में दो सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां हैं। इनके अलावा भारत सरकार, नागरिक उड्डन मंत्रालय और स्वास्थ्य मंत्रालय भी शामिल हैं।
इस लिस्ट के मुताबिक पिछले साल जनवरी से मार्च के बीच तीसरे स्थान पर मौजूद स्टेट बैंक ऑफ इंडिया इस साल पहले स्थान पर है। बैंकिंग सेक्टर की दूसरी बड़ी कंपनियां इस लिस्ट में कहीं नहीं हैं। मतलब साफ है एसबीआई ने प्रचार पर अपने प्रतिद्वंदियों से काफी अधिक पैसा खर्च किया… आखिर क्यों? ठीक इसी तरह दूसरे नंबर पर मौजूद है एक और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी बीएसएनल। जबकि टेलीकॉम सेक्टर की कोई और कंपनी टॉप टेन में शामिल नहीं है। वोडाफोन और रिलायंस ...... ((READ MORE AND COMMENT))
इस लिस्ट के मुताबिक पिछले साल जनवरी से मार्च के बीच तीसरे स्थान पर मौजूद स्टेट बैंक ऑफ इंडिया इस साल पहले स्थान पर है। बैंकिंग सेक्टर की दूसरी बड़ी कंपनियां इस लिस्ट में कहीं नहीं हैं। मतलब साफ है एसबीआई ने प्रचार पर अपने प्रतिद्वंदियों से काफी अधिक पैसा खर्च किया… आखिर क्यों? ठीक इसी तरह दूसरे नंबर पर मौजूद है एक और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी बीएसएनल। जबकि टेलीकॉम सेक्टर की कोई और कंपनी टॉप टेन में शामिल नहीं है। वोडाफोन और रिलायंस ...... ((READ MORE AND COMMENT))
Tuesday, June 2, 2009
बिहार की गुलाम पत्रकारिता ((पार्ट – 2))
नीतीश सरकार ने वहां के ज़्यादातर मीडिया संस्थानों की आर्थिक नस दबा रखी है। इसके लिए सरकारी विज्ञापनों को जरिया बनाया गया है। महंगाई के दौर में आज एक अख़बार को छापने की कीमत कम से कम 12 रुपये आती है। मगर वो बिकता है ढाई या फिर तीन रुपये में। लागत और बिक्री के बीच के इस अंतर को विज्ञापनों की मदद से पाटा जाता है। इसमें सरकारी विज्ञापनों की भूमिका बड़ी होती है। बस अख़बारों की ये कमजोरी, निरंकुश नेताओं को मनमानी करने की छूट दे देती है।
इसे विस्तार से समझने के लिए आप कभी बिहार सरकार के जन संपर्क विभाग की वेबसाइट पर जाएं। वहां आपको राज्य विज्ञापन नीति ( स्टेट एडवर्टिजमेंट पॉलिसी)- 2008 मिलेगी। इस नीति के तीसरे पेज पर चौथे कॉलम में साफ शब्दों में लिखा है कि “कोई भी समाचार पत्र-पत्रिका, जो कि स्वीकृत सूची में शामिल होने की अनिवार्य पात्रता रखते हैं, को स्वीकृत सूची में शामिल किया जाना समिति के लिए बाध्यकारी नहीं होगा”।...... ((READ MORE))......
इसे विस्तार से समझने के लिए आप कभी बिहार सरकार के जन संपर्क विभाग की वेबसाइट पर जाएं। वहां आपको राज्य विज्ञापन नीति ( स्टेट एडवर्टिजमेंट पॉलिसी)- 2008 मिलेगी। इस नीति के तीसरे पेज पर चौथे कॉलम में साफ शब्दों में लिखा है कि “कोई भी समाचार पत्र-पत्रिका, जो कि स्वीकृत सूची में शामिल होने की अनिवार्य पात्रता रखते हैं, को स्वीकृत सूची में शामिल किया जाना समिति के लिए बाध्यकारी नहीं होगा”।...... ((READ MORE))......
बिहार की गुलाम पत्रकारिता ((पार्ट – 1))
बिहार की राजधानी पटना में विकास के नाम पर एक केऑस (अफरा-तफरी) नज़र आता है। जगह जगह गड्ढे खुले पड़े हैं। जो परियोजाएं एक दो साल में पूरी हो जानी चाहिये थीं, वो लंबी और लंबी खिंचती जा रही हैं। ट्रैफिक की समस्या लगातार बनी हुई है। मुजफ्फरपुर का भी वही हाल है। बीच बाज़ार में आधा बना पुल विकास परियोजनाओं की खामियों की ओर इशारा करता है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि नीतीश के राज में कई ऐसी संस्थाओं और कंपनियों को भी परियोजनाएं बांटी गईं जिनके पास उनकी दक्षता नहीं थी। आखिर क्यों? कहीं उन लोगों का सरकार से कोई रिश्ता तो नहीं? रिश्ते सिर्फ़ ख़ून के ही तो नहीं होते। दिल, मतलब, सियासत और मजबूरी के रिश्ते भी तो हो सकते हैं। अगर रिश्ते हैं तो फिर मीडिया ने उनका खुलासा क्यों नहीं किया है? नीतीश की अंधभक्ति में जुटा मीडिया ख़राब पहलुओं पर सवाल खड़े क्यों नहीं कर रहा है? क्या अचानक बिहार के सभी भ्रष्ट अफ़सर ईमानदार हो गए हैं? क्या एक झटके में वहां की सारी बुराइयां ख़त्म हो गई हैं? इन सवालों का कोई सीधा जवाब नहीं है। इसे समझने के लिए लालू यादव और नीतीश कुमार के अंतर को .............. ((READ MORE))
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