Wednesday, June 17, 2009

ये अख़बार और ये पत्रकार … धन्य हैं

कुछ अख़बारों में छपी ख़बरों को पढ़ने के साथ ही आप समझ जाएंगे कि उसके पीछे क्या खेल है। अब मैं आज कुछ अख़बारों में छपी ख़बरों का नमूना पेश कर रहा हूं। आप इन्हें पढ़िये और सोचिए कि क्या इसी को रिपोर्टिंग कहते हैं?
हिंदुस्तान, 17 जून 2009
पेज नंबर – 8 (देश)
झंडा ढोने वाले गेस्ट, भाषण देने वाले होस्ट
पटना (हिं. ब्यू.) – मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का सरकारी आवास, एक अणे मार्ग। चुनाव के दौरान झंडा ढोने वाले पंगत में बैठकर भोजन कर रहे हैं और मंच से भाषण देने वाले परोसकर खिला रहे हैं। चुनाव में जीत की खुशियां बांटने का नीतीश कुमार का यह है नायाब अंदाज। वे खुद होस्ट की भूमिका में हैं। कोई छूट न जाए इसके लिए वे सबसे खुद मिल रहे हैं।लजीज भोजन, ऊपर से नेता से मिला सम्मान। सबके चेहरे के भाव के साथ उनकी भंगिमा बता रही है कि खुशी छुपाना उनके वश का नहीं रहा। दूसरी पंगत में बैठा एक कार्यकर्ता बगल वाले से कहता है “ओह! चुनाव के थकान आजे नु मिटल”, जवाब में दूसरा कहता है ..... ((READ MORE))

Tuesday, June 16, 2009

एक-दूसरे की हत्या करा रही है सरकार

अरुंधति रॉय से जनतंत्र की ख़ास बातचीत के पहले हिस्से में आपने मीडिया पर उनकी बेबाक राय पढ़ी। अब दूसरी और आखिरी किश्त … जिसमें मीडिया के साथ कुछ और बड़े मुद्दों पर चर्चा। इस बातचीत में अरुंधति ने कश्मीर के हालात पर… छत्तीसगढ़ में चल रहे नरसंहार पर… नंदीग्राम और सिंगूर की हिंसा पर… और भारत में चल रहे ब्रितानिया हुकूमत के औपनिवेशिक मॉडल पर खुल कर बात की। आप भी अरुंधति से हुए इस सवाल-जवाब को पढ़िये और अपनी राय रखिए।
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जितेंद्र – अक्सर कहा जाता है कि मीडिया फोर्थ स्टेट (चौथा स्तंभ) है … क्या सच में ये फोर्थ स्टेट है?
अरुंधति – मुझे लगता है कि शायद ये फर्स्ट स्टेट है। इनका जो रोल है वो बहुत बढ़ गया है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के तौर पर नहीं बल्कि स्टेटस्को (यथास्थितिवाद) बनाए रखने में बहुत बढ़ गया है। अभी आप देखो कि ये टीवी पर जो यंग पीपुल हैं, वही माहौल बना रहे हैं। कॉरपोरेट के खिलाड़ी हों, या डिफेंस के अफ़सर हों, नेता हों या फिर कोई और …. वो सबको बीच में रोक कर पूछते हैं कि सर क्या भारत को पाकिस्तान से रिश्ते तोड़ लेने चाहिये? क्या भारत को पाकिस्तान पर हमला बोल देना चाहिये? … ये आखिर क्या है? ये बहुत डरावना है। ....
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Sunday, June 14, 2009

"टीम इंडिया" की तरह "हिंदुस्तान" भी फिसड्डी

आज सुबह नींद खुली तो मैच का नतीजा जानने के लिए अख़बार उठाया। बीती रात भारत और इंग्लैंड के बीच बड़ा मैच था। धोनी ने टॉस जीत कर इंग्लैंड को बल्लेबाजी का न्यौता दिया और टीम इंडिया के गेंदबाजों ने उसके खिलाड़ियों को 153 रन पर रोक दिया। मैं ये मान कर सो गया कि अब भारत की जीत तय है और उसे सेमीफाइनल में पहुंचने से कोई नहीं रोक सकता। सुबह उठने पर नतीजा जानने की बेचैनी थी। सबसे पहले “हिंदुस्तान” हाथ लगा। उसके फ्रंट पेज पर पीटरसन और बोपारा की बड़ी सी तस्वीर थी। इस फोटो के नीचे लिखा था – “रविवार को भारत के साथ टी-20 वर्ल्ड कप के महत्वपूर्ण मुक़ाबले के दौरान एक्शन में पीटरसन"। साथ ही कुछ और कैप्शन भी दिये गए. जैसे “टॉस जीता – इंग्लैंड से मैच जीतने की जद्दोजहद में जुटी इंडिया" … ((READ MORE))

“कुंज बिहारी” को कैसे मिलेगी स्कॉलरशिप?

तीन दिन पहले हिंदुस्तान में एक छात्र कुंज बिहारी की कहानी छपी। बिहार के बिक्रमगंज में रहने वाले कुंज बिहारी ने दसवीं की परीक्षा में अपनी मेहनत से 85 फीसदी अंक हासिल किये। अखबार में होनहार कुंज बिहारी की दिक्कतों को पूरा ब्योरा दिया गया है। कैसे उस छात्र ने गोल-गप्पे बेच कर पढ़ाई की। कुंज ने हिंदुस्तान के रिपोर्टर को बताया कि “उसने मैट्रिक तक की पढ़ाई काफी दिक्कतों में पूरी की। खाने-पीने व पढ़ने के लिए पैसे का इंतजाम उसके पिता काफी मुश्किल से कर पाते थे।” उस रिपोर्ट में ये भी लिखा है कि “गुदड़ी के लाल की तमन्ना इंजीनियर बनने की है। वह किसी शीर्ष संस्थान से इंटर करना चाहता है पर घर की परिस्थितियां इसकी इजाजत नहीं दे रहीं। तीन छोटे भाई व दो बहनों के पालन-पोषण करने में अक्षम उसके पिता शिवजी सेठ उसकी पढ़ाई का खर्च उठाने में अपने को असमर्थ........ ((READ MORE))

Thursday, June 11, 2009

“बहुत महंगी है अभिव्यक्ति की आज़ादी”

अरुंधति रॉय से ख़ास बातचीत....

अभिव्यक्ति की आज़ादी क्या है? क्या भारत में आप और हम बोलने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं? क्या लोकतंत्र का चौथा स्तंभ - मीडिया पूरी तरह आज़ाद है? ये कुछ मुद्दे हैं जिन पर, वर्तमान दौर में चर्चा बेहद अहम हो गई है। लोकसभा चुनाव में सबने देखा कि किस तरह मीडिया ने लेन-देन का खेल किया। किस तरह ख़बरें दबाई गईं, मैनुपुलेट की गईं। जिन उम्मीदवारों के पास पैसा नहीं था वो चीखते रहे, चिल्लाते रहे, अपनी बात कहते रहे लेकिन उन्हें किसी अख़बार ने नहीं छापा। देश और दुनिया में ऐसी कई घटनाएं हो रही हैं जिसे कोई अख़बार नहीं छापता है। कोई टीवी न्यूज़ चैनल नहीं दिखाता है। आखिर क्यों? इन सब मुद्दों पर जनतंत्र डॉट कॉम के लिए जितेंद्र और समरेंद्र ने अरुंधति रॉय से बात की। बुकर पुरस्कार विजेता अरुंधति उन चंद साहसी लोगों में एक हैं जो सच कहने से नहीं डरते। सच चाहे अमेरिका के ख़िलाफ़ हो, चाहे कंपनियों के ख़िलाफ़ या फिर चाहे भारत सरकार के ख़िलाफ़।

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तो इसे कहते हैं साहसिक पत्रकारिता!

आप इंडियन एक्सप्रेस को यदि गौर से देखें तो वहां पर आपको लाल रंग से लिखा मिलेगा - जर्नलिज्म ऑफ करेज यानी साहस की पत्रकारिता। अगर आप उसके संपादकों से इस पर बात करें तो वो इस पर एक लंबा लेक्चर भी दे सकते हैं। वो बता सकते हैं कि साहसिक पत्रकारिता कैसे की जाती है? वो आपको एक्सप्रेस की परंपरा के बारे में भी ज्ञान देंगे। मगर आज उनके इस अख़बार ने एक बड़ी चूक कर दी है। ऐसी चूक जिसे किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। आज इंडियन एक्सप्रेस के फ्रंट पेज पर आपको कसाब की पहचान करने वाली 10 साल की मासूम और पिता की बड़ी तस्वीर दिखाई देगी। अजमल कसाब 26 नवंबर, 2008 को मुंबई में हुए आतंकी हमले का आरोपी है।
इसी साल मार्च में ये ख़बर उड़ी कि कसाब केस की सुनवाई की वीडियो क्लिप लीक कर दी गई है। जिसके बाद सरकार ने न्यूज़ चैनलों के लिए एक एडवाइजरी जारी की। ((READ MORE))

Wednesday, June 10, 2009

हिंदुस्तान, मृणाल पांडे और उनका बड़ा दिल

हिंदुस्तान ने ब्रिलियंट ट्यूटोरियल्स के साथ मिल कर “हिंदुस्तान कोचिंग स्कॉलरशिप” शुरू की है। अख़बार के मुताबिक ये स्कीम ऐसे गरीब बच्चों के लिए हैं जो मेधावी हैं, मगर पैसे की कमी के कारण कोचिंग सेंटरों में दाखिला नहीं ले पाते और डॉक्टर और इंजीनियर बनने से चूक जाते हैं। अख़बार की संपादक मृणाल पांडे पहले पन्ने पर देश की जनता से सवाल पूछती हैं – “तब क्या गरीबों के मेधावी बच्चों के सपने यूं ही बिखरते रहें?” फिर खुद ही उसका जवाब देती हैं – “नहीं।” वो आगे लिखती हैं - “हिंदुस्तान का मानना है कि ऐसे गरीब किंतु मेधावी बच्चों के सपनों का साकार कराने के लिए ठोस मदद देना हम सबका फर्ज है। इसलिए ब्रिलियंट ट्यूटोरियल्स के साथ हम इस वर्ष से एक नन्हा दीया इन सपनों की देहरी पर जला रहे हैं।”

सपनों की देहरी पर नन्हा दीया - जुमलेबाजी अच्छी है। लेकिन इस जुमलेबाजी में कई पेंच हैं। यहां सबसे बड़ा और पहला सवाल तो यही है कि अख़बारों का पहला दायित्व क्या है? नीतियों पर सवाल उठाना या फिर प्रचार के लिए पाठकों को इमोशनली ब्लैकमेल करना? ये सवाल बड़ा है और फिहलाल हम इस पर चर्चा रहने देते हैं। अभी बात हिंदुस्तान की जुमलेबाजी में छिपे उन खास बिंदुओं पर जो उसकी इस पूरी मुहिम को सरोकार कम, एक ओछे दर्जे का विज्ञापन ज़्यादा साबित करते हैं?

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