Wednesday, February 24, 2010

रेल बजट से पहले ज़ी न्यूज़ की "सबसे बड़ी" शर्म

"सबसे बड़ी शर्म" और "पर्दाफाश" जैसे जुमलों के साथ ज़ी न्यूज़ ने रेल बजट से ठीक पहले एक स्टिंग ऑपरेशन दिखाया। इसमें बताया गया कि चंद रुपये में "ट्रेन बिक जाती" है और महज "तीन हज़ार रुपये" में "प्लैटफॉर्म तक का सौदा" हो जाता है। यह भी खुलासा किया गया कि ट्रेन में सफ़र करते वक़्त आप जो खाना खाते हैं वो गंदे पानी से बना होता है और यह यात्रियों की सेहत के साथ बहुत बड़ा धोखा है।

रेल बजट से ठीक पहले इस स्टिंग ऑपरेशन के ज़रिये ज़ी न्यूज़ ने सबसे आगे निकलने की कोशिश की। आज सुबह भी टुकड़ों-टुकड़ों में उस स्टिंग ऑपरेशन को दिखाया गया। दर्शकों को रेलवे के ख़ौफ़नाक सच से रू-ब-रू कराने की कोशिश की गई। और यह ताल भी ठोंकी गई कि ज़ी न्यूज़ के इस ऐतिहासिक खुलासे के बाद रेलवे के बाबुओं पर ममता का डंडा चल सकता है। हो सकता है कि टीआरपी दौड़ में शायद उसे कुछ फायदा भी मिले.... ((read more))

Wednesday, February 3, 2010

राजेंद्र यादव, अरुंधती, उदित राज... बुलंद होती इंसाफ़ की आवाज़

महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय की तानाशाही के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद होने लगी है। प्रोफेसर अनिल चमड़िया को क्रूर तरीके से हटाए जाने के ख़िलाफ़ हस्ताक्षर अभियान तेज़ हो गया है। अब तक इस पर बड़ी संख्या में पत्रकारों, साहित्यकारों और प्रबुद्ध लोगों ने अपने हस्ताक्षर किए हैं। इसी कड़ी में जानी-मानी लेखिका, कार्यकर्ता और मानवाधिकारों की पक्षधर अरुंधती रॉय ने भी अपने हस्ताक्षर कर दिए हैं। मशहूर साहित्यकार और हंस के संपादक राजेंद्र यादव और फिल्मकार संजय काक ने दस्तख़त किए हैं। दलितों के हक़ के लिए लड़ने वाले उदित राज ने भी अनिल चमड़िया की बर्खास्तगी का विरोध किया है। ख़बरें यह भी आ रही हैं कि बजट सत्र के दौरान संसद में यह मुद्दा उठाने की तैयारी है। न केवल प्रोफेसर अनिल चमड़िया की बर्खास्तगी का मसला बल्कि महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में दलित छात्रों के उत्पीड़न का मसला भी उठाने की तैयारी है। अगर ऐसा हुआ तो यह एक बड़ी कोशिश होगी।

इस हस्ताक्षर अभियान के बारे में आपको कुछ बातें और बतानी हैं। बीते तीन दिन में बहुत पत्रकारों और साहित्यकारों से इस पर दस्तख़त करने की अपील की गई। कुछ लोगों ने हस्ताक्षर किए और कुछ ने यह कहते हुए मना कर दिया कि - वो जानते हैं कि अनिल चमड़िया के साथ ग़लत हुआ है लेकिन वो दस्तख़त नहीं करेंगे। कुछ ने कहा कि वो ऐसे ... ((read more))

Saturday, January 30, 2010

"पुलिसिया अंदाज में मुझे अपराधी साबित कर रहे हैं वीसी"

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अनिल चमड़िया ने अपनी बर्खास्तगी की पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाया है। उन्होंने साफ़ किया है कि वो दलित हितों की वकालत करते हैं लेकिन इस पूरे मामले को उनके दलितवादी होने की तरफ़ मोड़ देने के पीछे एक बड़ा प्रोपोगैंडा है। यह यूनिवर्सिटी के कुलपति विभूति नारायण राय की साज़िश है। अनिल चमड़िया पूछते हैं कि जब उनकी नियुक्ति उनकी जाति के आधार पर नहीं हुई थी फिर जाति का सवाल क्यों? जनतंत्र और मोहल्लालाइव की तरफ़ से भेजे गए सवालों के जवाब में अनिल चमड़िया ने जो जवाब भेजे हैं वो सोचने पर मजबूर करते हैं। अगर ये सभी बातें सही हैं तो विभूति नारायण राय जैसे व्यक्ति को कुलपति जैसे अहम ओहदे से तुरंत हटाया जाना चाहिए। इतना ही नहीं प्रोफेसर और छात्रों को मानसिक यंत्रणा देने के मामले में उनके ख़िलाफ़ कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए। - मॉडरेटर ... ((read more))

सब प्रो. कृष्ण कुमार वगैरह ने किया, वीएन राय पाक साफ!

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर विभूति नारायण राय की मानें तो प्रोफेसर अनिल चमड़िया की नियुक्ति निरस्त करने का फैसला प्रोफेसर कृष्ण कुमार, मृणाल पांडे, गंगा प्रसाद विमल और एक्जिक्यूटिव कौंसिल के बाकी सदस्यों का था। उनका इस फैसले से कोई लेना देना नहीं है और वो तो दरअसल अनिल चमड़िया को लेकर आए थे और उनके हाथ में होता तो वो अनिल चमड़िया को कतई न हटाते।

वीएन राय के इस भोलेपन पर कौन न फिदा हो जाए। लेकिन वी एन राय, क्या आप ये बताएंगे कि... ((read more))

Monday, January 18, 2010

इनके लिए ज्योति बसु की मौत भी पहली ख़बर नहीं

आज हिंदुस्तान देख कर कोई भी चौंक जाएगा। पहली ख़बर ठंड से जुड़ी हुई थी। मदन जैड़ा की रिपोर्ट जो मौसम वैज्ञानिकों के हवाले से तैयार की गई है। अगर मौसम वैज्ञानिकों की माने तो सर्दी देर से आई है और देर से जाएगी। यह ख़बर आप कल भी छाप सकते थे और कल भी छाप सकते हैं। चाहें तो अगर अगले साल जिस दिन भी कोहरा घना हो उस दिन उठा कर छाप दें। चार कॉलम की इस ख़बर के बगल में ज्योति बसु के निधन की ख़बर छपी है। दो कॉलम में। शायद हिंदुस्तान के संपादकों ने यह एक भद्दा मजाक किया है। वरना ज्योति बसु के निधन को पहली ख़बर बनाने की जगह मौसम वैज्ञानिकों के अनुमान पर आधारित एक ख़बर को पहली ख़बर बनाने का कोई तुक समझ नहीं आया।

यही हाल देश के नंबर वन अख़बार दैनिक जागरण का है। जागरण ने ज्योति बसु के निधन को पहली हेडलाइन के तौर पर ...... ((read more))

Thursday, January 7, 2010

सहारा टीम पर भरोसा है, हम कामयाब जरूर होंगे - उपेंद्र राय

उपेंद्र राय। स्टार न्यूज़ के तेज तर्रार रिपोर्टर। सीनियर एडिटर। और अब सहारा इंडिया परिवार के न्यूज़ डायरेक्टर। इतनी कम उम्र में किसी भी शख़्स को इतनी बड़ी जिम्मेदारी नहीं मिली। यह किसी भी शख़्स के लिए फक्र की बात होगी। उपेंद्र राय की इस कामयाबी पर आप या तो नाज़ कर सकते हैं या फिर रश्क। लेकिन आप उनकी इस कामयाबी को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। यह कामयाबी जितनी बड़ी है उससे कहीं अधिक बड़ी है सहारा मीडिया को उस मंजिल पर पहुंचाने की चुनौती जहां से यह सार्थक पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी पहचान बना सके। इस बेहद कठिन चुनौती को उपेंद्र राय और उनके साथी कैसे पूरा करेंगे इस बारे में जनतंत्र की तरफ से समरेंद्र ने उनसे बात की। यह बातचीत हम आपसे साझा कर रहे हैं। ... ((read more))

तो यह है स्टार न्यूज़ के धमाके का सच

हम यह बता चुके हैं कि स्टार न्यूज़ ने साल के पहले सप्ताह ही एक बड़ा धमाका किया है। उसने टीआरपी की रेस में न केवल इंडिया टीवी बल्कि आज तक को भी पटक कर नंबर वन की कुर्सी हथिया ली है। वह भी चमत्कारिक उछाल के साथ। उसकी टीआरपी में 3.4 अंकों की बढ़ोतरी हुई है। जहां कई बड़े चैनलों की कुल टीआरपी चार से नीचे हो वहां 3.4 अंकों की उछाल एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। लेकिन अब स्टार न्यूज़ के इस धमाके का एक और सच सुनिए। यह कारनामा तब हुआ है जब उसके सभी बड़े-छोटे अधिकारी मानेसर में ब्रेन स्ट्रॉमिंग कर रहे थे।... Read More

Thursday, December 31, 2009

क्या मीडिया का एक धड़ा एन डी तिवारी का चेला है?

आंध्र प्रदेश में पोल सिर्फ नारायण दत्त तिवारी की ही नहीं खुली बल्कि मीडिया ने भी अपना बहुत कुछ गंवा दिया है। इस मामले में कुछ मीडिया संस्थानों ने जिस तरह की रिपोर्टिंग की है उससे एक बार फिर साफ हुआ है कि अगर किसी के पास ताक़त है और जातिगत औरा है तो बड़े से बड़े अपराध और घिनौने मामले में भी उसके पक्ष में माहौल तैयार किया जा सकता है। यही नहीं ऐसा माहौल भी बनाया जा सकता है कि जिससे उस ताक़तवर शख़्स के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाले शख़्स या संस्था को उस दुस्साहस की क़ीमत चुकानी पड़े।

Friday, December 25, 2009

वॉयस ऑफ इंडिया में अशोक उपाध्याय का निधन

वॉयस ऑफ इंडिया के सीनियर प्रोड्यूसर अशोक उपाध्याय नहीं रहे। आज सुबह दफ़्तर में उनकी मृत्यु हो गई। अशोक उपाध्याय करीब तीन-चार हफ्तों से लगातार नाइट शिफ्ट में काम कर रहे थे। आज सुबह उनकी तबीयत कुछ ख़राब हुई। बेचैनी मसहूस हुई। जिसके बाद वो खुली हवा में सांस लेने के लिए दफ़्तर से बाहर निकल आए और कुछ देर के लिए कार में बैठ गए। थोड़ी देर एक जूनियर लड़की उन्हें ढूंढते हुए पहुंची। उसने देखा कि वो कार में लेटे हुए हैं। उसके बाद जब मॉर्निंग शिफ्ट की टीम पहुंची तो हैंडओवर के लिए अशोक उपाध्याय को ढूंढा जाने लगा। तब लड़की ने बताया कि वो कार में लेटे हुए हैं और कुछ बोल नहीं रहे। फिर एक साथी वहां पहुंचा और उसने अशोक उपाध्याय को झकझोरा। लेकिन उनकी नींद नहीं टूटी।... ((read more))

Thursday, December 24, 2009

इस 'सिस्टम' में बार बार मरेगी रुचिका

♦ प्रभात शुंगलू


टीवी चैनलों पर चंडीगढ़ की विशेष अदालत के बाहर एसपीएस राठौर को हंसते, खिलखिलाते देखा तो लगा सरकार ने हरियाणा के पूर्व डीजीपी को किसी बड़े सम्मान से नवाज़ा हो। ये चेहरा उस शख़्स का चेहरा नहीं था जिसको अदालत ने 14 साल की लड़की रुचिका गिरहोत्रा के साथ छेड़खानी करने के आरोप में दोषी पाया हो। अदालत के फैसले में राठौर को अपनी जीत नज़र आई। जिस अदालत ने दोषी पाते हुए 6 महीने की क़ैद की सज़ा सुनायी उसी अदालत से तुरत फुरत ज़मानत भी मिल गयी। पूर्व डीजीपी सीना फूला कर अपने घर के लिए निकला। मानो वो मीडिया और देश को चिढ़ा रहा हो कि देखो कानून मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। .... ((Read More))

पी साईनाथ के जरिए महाराष्ट्र का सच जान कर प्रभाष जोशी को याद करें

मराठी, हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू – राज्य के तमाम अख़बारों में चुनाव के दौरान आप ऐसी कई आश्चर्यजनक चीजें देखेंगे जिन्हें छापने से इनकार नहीं किया गया था। एक ही सामाग्री किसी अख़बार में "ख़बर" के तौर पर छपी तो किसी अख़बार में "विज्ञापन" के तौर पर। "लोगों को गुमराह करना शर्मनाक है" – यह शीर्षक है नागपुर (दक्षिण-पश्चिम) से निर्दयील उम्मीदवार उमाकांत (बबलू) देवताले की तरफ़ से खरीदी गई ख़बर की। यह ख़बर लोकमत (6 अक्टूबर) में प्रकाशित हुई थी। उसके आखिरी में सूक्ष्म तरीके से एडीवीटी (एडवर्टिजमेंट यानी विज्ञापन) लिखा हुआ था। द हितवाद (नागपुर से छपने वाले अंग्रेजी अख़बार) में उसी दिन यह "ख़बर" छपी और उसमें कहीं भी विज्ञापन दर्ज नहीं था। देवताले ने एक बात सही कही थी – "लोगों को गुमराह करना शर्मनाक है।" ... read more

Wednesday, December 23, 2009

राठौर आदरणीय क्यों? मीडिया के भाषाई संस्कार पर सवाल


  • दिलीप मंडल
....

रुचिका के साथ छेड़खानी और उसकी आत्महत्या के मामले में भारतीय न्यायव्यवस्था ने कुछ नया या अजूबा नहीं किया है। न्यायप्रक्रिया में धन और रुतबे के महत्व के बारे में ये केस कोई नई बात नहीं कहता। देश के राष्ट्रपति रहे के आर नारायणन ने जब ये कहा था कि आजादी के बाद जिन लोगों को फांसी की सजा हुई है उनमें से कोई भी अमीर नहीं था, तो वो इसी सच को उद्धाटित कर रहे थे। हरियाणा के पूर्व पुलिस महानिदेशक एस.पी.एस. राठौर के साथ जो होने वाला है उसका अंदाजा हम इस मुकदमे की सुस्त रफ्तार से लगा सकते हैं। 19 साल में ये केस स्थानीय न्यायालय की सीमा को ही पार कर पाया है। इस रफ्तार से केस चला तो राठौर को जीवन का एक भी दिन शायद ही जेल में काटना होगा। ... Read More

मीडिया की मुहिम के बाद अब राठौर की खाल नहीं बचेगी


  • अजीत अंजुम
....

इस मामले (रुचिका के साथ हुई छेड़खानी और उसके बात पुलिसिया जुल्मों के जरिए उसे आत्महत्या के मुंह में ढकेलने और इस संगीन मामले में अदालत के बेतुके फैसले) को मीडिया ने पूरी जिम्मेदारी और गंभीरता के साथ उठाया है। आज तीसरे दिन भी अखबारों और न्यूज चैनलों पर रूचिका से साथ हुई नाइंसाफी का मामला छाया है। कोर्ट के फैसले के बाद हंसते हुए पूर्व डीजीपी राठौर की बेशर्मी और कानून को अपने ठेंगे पर रखने की उनकी हिमाकत को मीडिया ने खूब उछाला है। कई न्यूज चैनलों ने राठौर को मिली मामूली सज़ा के ख़िलाफ़ लगातार मुहिम चला रखी है। अब क्या चाहते हैं ? मीडिया इससे ज़्यादा क्या कर सकता है ? सच तो ये है कि आज से करीब 19 साल पहले जब ये मामला हुआ था, तब टीवी तो था नहीं, अखबार भी इतने नहीं ... Read More

कुंबले-धोनी मॉडल से सबक लें बीजेपी और कांग्रेस

देश के महान गेंदबाज अनिल कुंबले और सियासत के माहिर खिलाड़ी लाल कृष्ण आडवाणी का दूर-दूर तक कोई नाता नहीं, लेकिन अपने-अपने क्षेत्र में ये दोनों लीडरशिप को लेकर दिलचस्प केस स्टडी बन सकते हैं।

भारत जब टेस्ट क्रिकेट में दुनिया की नम्बर वन टीम बना, तो पूर्व कप्तान कुंबले ने अपने कॉलम एक अहम बात कही..."20 महीने पहले गैरी कर्स्टन के कोच बनने के बाद पूरी टीम ने नम्बर वन बनने का सपना देखा था। मैं कप्तान के तौर पर इस हसरत का हिस्सा रहा। लेकिन नंबर वन बनने में हर किसी का योगदान रहा। इसकी एक बड़ी वजह रही कि हर किसी के मन में ये साफ था कि हमें पहुंचना कहां है। ये पहले से ही तय था कि मेरा उत्तराधिकारी कौन होगा जिससे कि ये मिशन इसी मजबूती के साथ आगे बढ़ सके” अनिल कुंबले टेस्ट कप्तानी में अपने उत्तराधिकारी महेंद्र सिंह धोनी की ओर इशारा कर रहे थे...अगर कुंबले-धोनी दौर इस बात की मिसाल है कि कैसे अगली पीढ़ी को बेटन थमाया जाना चाहिए तो अटल-आडवाणी दौर इस बात की गवाह रही कि उत्तराधिकार तय करने में लापरवाही और दिशाहीनता कैसे एक पार्टी, एक विचारधारा और एक सोच को हाशिए पर ले जाती है।... ((Read More))

डरे हुए मोदी जनता की हर सांस पर पहरा बिठाना चाहते हैं

गुजरात विधानसभा में नगरपालिका चुनावों में कम्पल्सरी (अनिवार्य) वोटिंग का बिल ध्वनिमत से पास हुआ। वोटिंग होती भी तो सदन में ये बिल पास कराना सरकार के लिए मुश्किल नहीं था। लेकिन सवाल ये है कि आखिर कम्पल्सरी वोटिंग से क्या हासिल करना चाहती है मोदी सरकार? क्या दूसरी राज्य सरकारें या केन्द्र भी इस तरह का कानून लाएगा इस पर बहस छिड़ गयी है।

ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर और स्विट्जरलैंट जैसे देशों में अनिवार्य वोटिंग का कानून है। ऑस्ट्रेलिया में ये लगभग सौ साल पुराना कानून है जिसकी कहानी भी दिलचस्प है। पहली बार ऑस्ट्रेलिया में ये कानून 1914 में बना जब लिबरल पार्टी की सरकार थी। और ये कानून इसलिए बना क्योंकि उस साल क्वीन्सलैंड राज्य में चुनाव का वोट प्रतिशत 75 फीसदी था। और अगले साल यानि 1915 में देश में चुनाव होने वाले थे। लिबरल पार्टी को ये डर था कहीं लेबर पार्टी बाजी न मार ले जाए क्योंकि लेबर पार्टी के वोटर ज्यादा संगठित थे। इस कारण लिबरल पार्टी ने ये कानून बनाया मगर अगले साल के चुनाव में वो लेबर पार्टी से हार ही गयी। कहीं ऐसा तो नहीं कि लोक सभा में हार झेलने के बाद गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को अब बीजेपी के शहरी वोटर के दरकने का ख़तरा नज़र आ.... ((Read More))

Tuesday, December 22, 2009

अपराधी ताक़तवर हो तो मीडिया करता है सलाम

अपराधियों को लेकर भी मीडिया का चरित्र दोहरा है। अगर किसी साधारण शख़्स के ख़िलाफ़ अपराध साबित नहीं हुआ हो तो भी पत्रकार उसके लिए सख़्त भाषा का इस्तेमाल करते हैं। एक तरीके से अपराधी घोषित कर देते हैं। लेकिन अगर वही शख़्स ताक़तवर हो तो पत्रकारों और मीडिया संस्थानों की भाषा बदल जाती है। चाहे उस शख़्स का जुर्म साबित ही क्यों न हो गया हो। चाहे अदालत ने उसे गुनहगार ठहरा कर सज़ा ही क्यों न सुना दी हो।

ताज़ा मामला हरियाणा के पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौर से जुड़ा है। राठौर ने 19 साल पहले एक 14 साल की नाबालिग लड़की रुचिका गेहरोत्रा से छेड़खानी की थी। और मामला दर्ज होने के बाद इस वहशी दरिंदे ने रुचिका और उसके घरवालों को मानसिक यंत्रणा दी। अपने पुलिसिया ताक़त के जोर पर उनकी ज़िंदगी नर्क बना दी। आखिर में रुचिका ने 17 साल की उम्र में आत्महत्या कर ली और 2002 में उसके भाई ने भी आत्महत्या कर ली। राठौर के कुकर्मों की वजह से एक परिवार बर्बाद हो गया जबकि राठौर की तरक्की होती चली गई। सत्ता और नेताओं से गठजोड़ का फायदा उठा कर वह हरियाणा का डीजीपी बना और 2002 में .... read more

हिंदुस्तान टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट के बीच करार

हिंदुस्तान टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट के बीच कंटेंट के लिए करार हुआ है। अगले साल की पहली तारीख से लागू होने वाले इस करार का औपचारिक ऐलान कर दिया गया है। इस समझौते के मुताबिक हिंदुस्तान टाइम्स अब वाशिंगटन पोस्ट और न्यूज़वीक की ख़बरों और विश्लेषण को एक्सक्लूसिव तौर पर भारतीय पाठकों को मुहैया करा सकेगा। ख़बरों और लेखों के अलावा हिंदुस्तान टाइम्स में अब न्यूज़वीक के संपादक फरीद जकारिया, कॉलमिस्ट रॉबर्ट सेम्युल्शन और इंटरनेशनल हेराल्ड ट्रिब्यून के पूर्व संपादक डेविड इग्नेशियस जैसे चर्चित लेखकों और विचारकों के कॉलम भी छापे जाएंगे। इसके साथ ही हिंदुस्तान टाइम्स को बीजिंग, इस्लामाबाद, काबुल, बगदाद, लंदन, मास्को, नैरोबी, तेहरान, टोक्यो, मैक्सिको सिटी और पेरिस समेत दुनिया के कई देशों में मौजूद वाशिंगटन पोस्ट के संवाददाताओं की ख़बरों को एक्सक्लूसिव तौर पर छापने का अधिकार मिल गया है। ... read more

Monday, December 21, 2009

26/11 पर राम प्रधान कमेटी की रिपोर्ट पेश, कठघरे में गफूर

मुंबई में 26/11 के हमले के दौरान पुलिस की भूमिका की जांच के लिए बनी राम प्रधान कमेटी की रिपोर्ट आज महाराष्ट्र विधानसभा में रख दी गई। इस रिपोर्ट में कई खामियों की तरफ़ ध्यान खींचा गया है। तब के मुंबई पुलिस कमिश्नर हसन गफूर की जमकर खिंचाई की गयी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि गफूर पूरे ऑपरेशन के दौरान अपनी टीम का सही ढंग से नेतृत्व नहीं कर सके। वो ऑपरेशन के दौरान ट्राईडेंट होटल के बाहर जमे रहे और कंट्रोल रूम में नहीं गए, जो ग़लत था। यहां तक कि उन्होंने हमले के बाद सभी संबंधित लोगों को इसकी ठीक से जानकारी भी नहीं दी। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में मंत्रालय, सचिवालय और पुलिस के बीच तालमेल की कई कमियों को भी उजागर किया है। हालांकि इसी रिपोर्ट में ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर राकेश मारिया की ... ((read more))

इलाहाबाद में मुन्नी मोबाइल का लोकार्पण

पत्रकार प्रदीप सौरभ के पहले उपन्यास मुन्नी मोबाइल का आज इलाहाबाद में लोकार्पण हुआ। मशहूर आलोचक और विद्वान प्रोफेसर राजेंद्र कुमार ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के निराला सभागार में लोकार्पण समारोह की अध्यक्षता की। प्रोफेसर राजेंद्र कुमार बहुवचन पत्रिका के संपादक भी हैं। इस मौके पर उन्होंने कहा कि भूमंडलीकरण समाज को जोड़ता नहीं बल्कि बांटता है। एक नहीं होने देता। और साम्प्रदायिकता भी यही काम करती है। इन दोनों संदर्भों में प्रदीप सौरभ का उपन्यास मुन्नी मोबाइल काफी अहम है। यह उपन्यास साम्प्रदायिकता और भूमंडलीकरण – दोनों के ख़तरों से लोगों को आगाह करता था। प्रोफेसर राजेंद्र कुमार ने यह भी कहा कि मीडिया में रहते हुए यथार्थ को सामने लाना किसी चुनौती से कम नहीं। वह भी तब जब कहा जा रहा हो कि मीडिया बज़ार की ... (( read more))

Sunday, December 20, 2009

हिंदुस्तान-अमर उजाला में समझौता नहीं, एफ़आईआर दर्ज

बरेली में हिंदुस्तान और अमर उजाला के बीच कोई सुलह-सफाई नहीं हो सकी। जिसके बाद दोनों पक्षों ने इज्जत नगर थाने में एक दूसरे के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करा दी है। सूत्रों के मुताबिक हिंदुस्तान ने अमर उजाला के सात लोगों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कराया है जबकि अमर उजाला की तरफ से भी छह लोग नामजद कराए गए हैं। हिंदुस्तान की शिकायत पर आईपीसी की धारा 397 और 395 के तहत घायल करके लूटपाट करने का मामला दर्ज हुआ है। जबकि अमर उजाला की तरफ से लूटपाट की शिकायत की गई है। दोनों ही पक्षों ने एक दूसरे के प्रसार मैनेजर को आरोपी बनाया है। ... read more