Sunday, August 23, 2009

वॉयस ऑफ इंडिया का प्रसारण फिर शुरू

वॉयस ऑफ इंडिया का प्रसारण फिर शुरू हो गया है। दो दिन पहले चैनल के कर्मचारियों की हड़ताल से इसका प्रसारण रुक गया था। लेकिन मैनेजमेंट के आश्वासन के बाद सभी कर्मचारी बिना शर्त काम पर वापस लौट आए हैं। रात 12 बजे बुलेटिन रोल किया गया और उसके साथ ही चैनल फिर से ऑनएयर हो गया ।

शुक्रवार को जोरदार हंगामे के बाद तकनीकी कर्मचारियों ने चैनल का प्रसारण रोक दिया गया था। तीन महीने से तनख्वाह नहीं मिलने के कारण वो काफी निराश थे। उसी बीच कहीं से अफवाह उड़ी कि कंपनी चैनल को बंद करने जा रही है। इस अफवाह से उनकी उम्मीदें टूट गईं और गुस्सा भड़क गया। उन्होंने चैनल का प्रसारण रोक दिया और बात यहां तक पहुंची कि पुलिस बुलानी पड़ी। लेकिन अब सबकुछ सामान्य है।

वॉयस ऑफ इंडिया के समूह संपादक किशोर मालवीय के मुताबिक ..((. read more))

Friday, August 21, 2009

“वॉयस ऑफ इंडिया” ख़ामोश

वॉयस ऑफ इंडिया का प्रसारण बंद हो गया है। कर्मचारियों के विद्रोह के बाद वहां पर पुलिस बुलानी पड़ी। वॉयस ऑफ इंडिया का दफ़्तर दिल्ली से सटे नोएडा में है और आज शाम न्यूज़ चैनल के कर्मचारियों ने उसका प्रसारण रोक दिया। ख़बरों के मुताबिक उन कर्मचारियों को बीते तीन महीने से तनख्वाह नहीं मिली है और मैनेजमेंट के रवैये से वो बेहद भड़के हुए हैं।

वॉयस ऑफ इंडिया त्रिवेणी ग्रुप का न्यूज़ चैनल है। उसमें करीब दो सौ कर्मचारी काम करते हैं। उन सभी को पिछले साल दिसंबर में भी तनख्वाह नहीं मिली थी। वो विवाद पहले से था। उसके अलावा मई से उन्हें तनख्वाह नहीं दी गई है। इसी बीच कहीं से एक ख़बर आई कि आज रात कंपनी चैनल को बंद कर सकती है। जिसके बाद कर्मचारियों के सब्र का बंध टूट गया। उन्होंने तुरंत प्रसारण रोक दिया और धरने पर बैठ गए। कर्मचारियों के उग्र तेवर को देखते हुए वहां पर पुलिस बुलानी पड़ी है। ... ((READ MORE))

प्रभाष जी की पंडिताई में तथ्यों की ऐसी-तैसी

प्रभाष जोशी बड़े पत्रकार हैं। बहुत बड़े पत्रकार। इसलिए इतनी उम्मीद की जाती है कि उनके विचार चाहे जो भी हों, लेकिन उन्हें स्थापित करने के लिए वो सही तथ्य लेकर आएंगे। लेकिन रविवार डॉट कॉम में दिए इंटरव्यू में अपनी बातों को साबित करने के लिए वो बेहद बेतुकी बातें कर गए हैं। एक दो नहीं बल्कि कई ग़लत तथ्यों को प्रस्तुत किया। लगता है कि सुनी सुनाई बातों को वो सच मान बैठे हैं। फैक्ट्स के मामले में ऐसी असावधानी अक्षम्य है क्योंकि आप प्रभाष जोशी हैं, शलाका पुरुष। ... (READ MORE)

हर चीज को जाति के चश्मे से मत देखिए प्रभाष जी

पत्रकारिता में आने से पहले से प्रभाष जोशी को पढ़ रहा हूं। उनके लिखे ने उनका सम्मान इतना बढ़ाया है कि कई बार दूसरों से बहस में झगड़े की नौबत आ गई। प्रभाष जोशी के विरोधी उन पर दो ही आरोप लगाते रहे हैं एक कि भीतर से वो घोर संघी हैं और दूसरी घोर ब्राह्मणवादी। लेकिन जो भी मुझसे ये कहता था मैं उसे "हिंदू होने का धर्म" पढ़ने की सलाह दे देता। बीते 17 साल के लेखन में प्रभाष जी ने बीजेपी की जो खाट खड़ी की है उससे एक धारणा तो ऐसी बनती ही है कि वो संघ के मुरीद होंगे तो होंगे लेकिन उनकी कलम संघ के बंधन में नहीं है। केंद्र में जब एनडीए की सरकार थी तब मैंने कई बार जनसत्ता में प्रभाष जी के तीखे लेख पढ़े हैं। उन्होंने स्वयंसेवक प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की कई मुद्दों पर कड़ी आलोचना की है। वैसी आलोचना कोई खांटी पत्रकार ही कर सकता है।

ये सम्मान हाल-फिलहाल और बढ़ गया, जब प्रभाष जी ने समाचार पत्रों की दलाली के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला। वैसे इस मसले को उठाने का श्रेय वॉल स्ट्रीट जरनल के पॉल बेकेट को दिया जाना चाहिए। उन्होंने ही मई की शुरुआत में अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया था कि ख़बरों के पैकेज का कैसा गंदा खेल चल रहा है? लेकिन यह भी एक सत्य है कि प्रभाष जी के लेख के बाद इस मुद्दे पर जो बहस हुई है उससे थोड़ी हलचल जरूर हुई। प्रभाष जी ने दस मई को अपना पहला लेख लिखा "ख़बरों के पैकेज का काला धंधा।" अगले हफ़्ते 17 मई को दूसरा लेख लिखा "चौकीदार का चोर होना।" घूम घूम कर इस मुद्दे पर हवा बनाने लगे। लगा कि प्रभाष जी की अगुवाई में दलाली करने वालों को सज़ा भले ही नहीं मिले लेकिन दलालों की असलियत सामने ज़रूर आएगी। उस बहस से लोगों के दिलो दिमाग पर पड़ी धूल झड़ जाएगी। ठंडे पड़े लहू में हल्का ही सही उबाल आएगा। भविष्य में सकारात्मक बदलावों की नींव तैयार होगी। लेकिन ऐसा होता उससे पहले ही प्रभाष जी ने अपने विरोधियों को अपने ऊपर हमले का एक औजार थमा दिया है। सिर्फ़ विरोधियों को ही क्यों मुझ जैसे कई प्रशंसकों का मोह भी भंग .... (READ MORE)

क्या यही आपकी परंपरा है प्रभाष जी?

रविवार डॉट कॉम पर छपे प्रभाष जोशी के इंटरव्यू ने एक झटके में वह सब सामने ला दिया है जो अब तक पर्दे की ओट में था। एक गांधीवादी, अहिंसावादी, सेक्यूलर और जनपक्षीय संपादक-पत्रकार का यह असली सच जितना चौंकाता है, इससे कहीं अधिक आक्रोश पैदा करता है। लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करने वाले इस वरिष्ठ पत्रकार-लेखक ने इस इंटरव्यू में परंपरा, ट्रेनिंग और कौशल के बहाने न केवल लोकतंत्र की आत्मा को घायल किया है, बल्कि उन लोगों को भी अपमानित किया है, जिनकी सामाजिक पृष्ठभूमि प्रभु वर्ग की नहीं है।

अपने साक्षात्कार में जोशी जी ने कहा है "विनोद कांबली का एटीट्यूड बना कर रखने और लेकर जाने का नहीं है। कुछ कर दिखाने का है।" अब जोशी जी को क्या यह बताना पड़ेगा कि कांबली जिस सामाजिक पृष्ठभूमि से आते हैं, वहां सम्मान के साथ जीने की एकमात्र शर्त है- कुछ कर दिखाने का जज्बा। कभी-कभी तो कुछ कर दिखाने का जज्बा भी उनके जी का जंजाल बन जाता है। यकीन न आए तो खैरलांजी की घटनाओं को फिर से याद कर लीजिए। तस्वीर साफ हो जाएगी।... (READ MORE)

Wednesday, August 19, 2009

ब्रह्म से संवाद करते ब्राह्मण यानी प्रभाष जोशी का विराट रूप देखिए

"सिलिकॉन वैली अमेरिका में नहीं होता, अगर दक्षिण भारत में आरक्षण नहीं लगा होता. दक्षिण के आरक्षण के कारण जितने भी ब्राह्मण लोग थे, ऊंची जातियों के, वो अमरीका गये और आज सिलिकॉन वेली की हर आईटी कंपनी का या तो प्रेसिडेंट इंडियन है या चेयरमेन इंडियन है या वाइस चेयरमेन इंडियन है या सेक्रेटरी इंडियन है. क्यों ? क्योंकि ब्राह्मण अपनी ट्रेनिंग से अवव्यक्त चीजों को हैंडल करना बेहतर जानता है. क्योंकि वह ब्रह्म से संवाद कर रहा है. तो जो वायवीय चीजें होती हैं, जो स्थूल, सामने शारीरिक रूप में नहीं खड़ी है, जो अमूर्तन में काम करते हैं, जो आकाश में काम करते हैं. यानी चीजों को इमेजीन करके काम करते हैं. सामने जो उपस्थित है, वो नहीं करते. ब्राह्मणों की बचपन से ट्रेनिंग वही है, इसलिए वो अव्यक्त चीजों को, अभौतिक चीजों को, अयथार्थ चीजों को यथार्थ करने की कूव्वत रखते है, कौशल रखते हैं. इसलिए आईटी वहां इतना सफल हुआ. आईटी में वो इतने सफल हुए."

ये कौन बोल रहा है और इस समय ऐसा क्यों बोल रहा है। राज्यसभा चुनाव से ठीक पहले ये कौन है जो अपने ब्राह्मण रूप का सार्वजनिक प्रदर्शन कर रहा है। इस खास समय में एक साथ हिंदूत्ववादियों-आरएसएस और कम्युनिस्टों को आजादी की लड़ाई का गद्दार कहते हुए वो क्या हासिल करना चाहता है। .... (READ MORE)

सहारा के कर्मचारी नहीं करेंगे सरेंडर

सहारा से हटाए जा रहे कर्मचारी अब लंबी लड़ाई लड़ने का मन बना रहे हैं। करीब 30-35 कर्मचारियों का एक दल आज लखनऊ गया है। इन कर्मचारियों की कोशिश सहारा के मालिक सुब्रत राय से मुलाकात करने की है। अगर उनसे भेंट नहीं हुई या फिर भेंट होने पर कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला तो ये कर्मचारी उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती से मिलने की कोशिश करेंगे। कर्मचारियों का कहना है कि अगर जरूरत पड़ी तो वो अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे लेकिन इस्तीफ़ा नहीं देंगे।

कर्मचारी मंदी की दलील को हजम करने को तैयार नहीं। नाम नहीं छापने की शर्त पर .... ((READ MORE))